जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को लगभग आठ महीने बाद मंगलवार (24 मार्च, 2020) को हिरासत से रिहा कर दिया गया। जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत लगाए गए आरोप हटाए जाने के बाद उनकी रिहाई का आदेश जारी किया गया। गत 10 मार्च को 50 साल के हुए अब्दुल्ला ने पिछले साल पांच अगस्त को जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद, 232 दिन हिरासत में गुजारे। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता को पूर्व में एहतियातन हिरासत में लिया गया था, लेकिन बाद में पांच फरवरी को उन पर पीएसए लगा दिया गया था।
जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान निरस्त करने से एक दिन पहले चार अगस्त की रात पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को हिरासत में लिया गया था। उमर की बहन सारा पायलट ने पीएसए के तहत भाई की हिरासत को चुनौती दी थी। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट ने 17 मार्च को सुनवाई करते हुए सारा की याचिका पर प्रशासन से इस हफ्ते जवाब मांगा था।
मामले में जस्टिस अरुण मिश्रा ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन पूछा था कि अगर उमर अब्दुल्ला को रिहा करने की योजना है तो जल्द इसपर संज्ञान लें। कोर्ट ने कहा कि अगर उन्हें रिहा नहीं किया गया तो उनकी बहन की याचिका पर सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन के वकील से भी कहा था कि इस पर केंद्र सरकार से निर्देश प्राप्त करें और कोर्ट को जानकारी दें।
इसी बीच राज्य के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला ने बेटे की रिहाई के बाद उनसे मुलाकात की। पिछले करीब आठ महीनों में पिता और बेटे की यह पहली मुलाकात थी। उल्लेखनीय है कि 9 मार्च को आठ विपक्षी पार्टियों ने केंद्र से मांग की थी कि जम्मू-कश्मीर के तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूक, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को तत्काल रिहा किया जाए। विपक्षी नेताओं ने कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं कि इन लोगों की गतिविधियों ने राष्ट्रीय हितों को खतरे में डाला हो।
सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, सीपीआई के डी राजा, राजद नेता मनोज झा,एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी, जेडीएस नेता एचडी देवेगौड़ा, पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने बयान जारी कर पूर्व मुख्यमंत्रियों को रिहा करने की मांग की थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने 13 मार्च को फारुक अब्दुल्ला को रिहा कर दिया था।

