वैश्विक अर्थव्यवस्था एक चुनौतीपूर्ण और अनिश्चित परिदृश्य का सामना कर रही है, क्योंकि यह महामारी के बाद और यूक्रेन पर रूस के आक्रमण जैसे भू-राजनीतिक तनाव से जूझ रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका और प्रमुख यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं में उम्मीद से अधिक मुद्रास्फीति के कारण वैश्विक वित्तीय स्थिति सख्त होने से पहले नकारात्मक जोखिम की आशंका थी, जो अब वास्तविकता बन रही है।
यह समस्या चीन की मंदी, कोविड-19 के प्रकोप और पूर्णबंदी के कारण और बढ़ गई और यूक्रेनी संघर्ष से नकारात्मक प्रभाव ने इस वर्ष की दूसरी तिमाही के दौरान वैश्विक उत्पादन में संकुचन में योगदान दिया है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का आधारभूत पूर्वानुमान दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं- संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और यूरोपीय क्षेत्र की वृद्धि में महत्त्वपूर्ण मंदी का संकेत देता है, जिसके वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण पर महत्त्वपूर्ण परिणाम होंगे। अमेरिका में कम घरेलू क्रय शक्ति और सख्त मौद्रिक नीतियों के कारण इस वर्ष विकास दर घटकर 2.3 प्रतिशत और अगले वर्ष एक प्रतिशत रहने का अनुमान है।
पूर्णबंदी और गहराते भू-जायदाद संकट के कारण चीन की वृद्धि दर 3.3 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है, जो महामारी को छोड़कर चार दशकों में सबसे धीमी है। इस बीच यूरो क्षेत्र की वृद्धि को संशोधित कर इस वर्ष 2.6 प्रतिशत और 2023 में 1.2 प्रतिशत कर दिया गया है, जो यूक्रेन में युद्ध और सख्त मौद्रिक नीतियों के प्रभाव को दर्शाता है।
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश पर काफी हद तक निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए धीमी वैश्विक अर्थव्यवस्था चुनौतियां खड़ी करती है। इन बाधाओं को दूर करने के लिए भारत सरकार को व्यापार साझेदारी में विविधता लाने, बुनियादी ढांचे के विकास और रोजगार सृजन के माध्यम से घरेलू मांग को मजबूत करने, निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों का समन्वय करने और व्यापार करने में आसानी में सुधार के लिए संरचनात्मक सुधारों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
इन प्रमुख कदमों को उठाकर भारत धीमी अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बीच भी लचीलापन बना सकता है और विकास को बनाए रख सकता है, ताकि एक उज्ज्वल और अधिक स्थिर आर्थिक भविष्य सुनिश्चित हो सके।
अवनीश कुमार गुप्ता, आजमगढ़।
मोबाइल का स्वास्थ्य पर पड़ रहा है सबसे अधिक दुष्प्रभाव
भारत में 1980-90 के दशक में डिजिटलीकरण के बढ़ते कदमों के बाद से तकनीकी विकास के रास्ते खुले। पहले टेलीफोन, फिर कंप्यूटर, फिर इंटरनेट, फिर टीवी और फिर सबसे महत्त्वपूर्ण मोबाइल का भारतीय बाजार में आगमन हुआ। 90-95 के दौर में आई मोबाइल शुरुआत में एक सबसे उच्च और धनी वर्ग के लिए कीमती वस्तु थी।
तब फोन आने के भी चार रुपए लगा करते थे। मगर समय के साथ वैश्वीकरण ने अपना काम किया और जो तकनीक सहूलियत के लिए बनाई गई थी, वही आज कई स्तरों पर अभिशाप भी बनती जा रही है।
लोग आज घंटों तक मोबाइल पर अपना समय व्यर्थ करते हैं। इस एक मुख्य वजह से अपने ही समाज और परिवार में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। बहुत सारे लोग तो चौबीस घंटे में से औसतन सात से आठ घंटे मोबाइल पर गुजारते हैं।
इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अधिक समय तक मोबाइल स्क्रीन देखने से व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। साथ ही आंखों की रोशनी भी समय से पहले कमजोर हो जाती है। कई मामलों में लोग दृष्टिबाधित भी हुए हैं।
ऐसे में अपने ‘स्क्रीन टाइम’ यानी मोबाइल के स्क्रीन में गुम रहने के वक्त का खयाल रखना बहुत जरूरी है। इसके लिए आजकल फोन में ही ‘डिवाइस कंट्रोल’ नाम की एक सुविधा उपलब्ध रहती है। बेवजह फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर रील और छोटे वीडियो देखने से बचना चाहिए। यह किसी मादक पदार्थ की तरह काम करता है और व्यक्ति को मोबाइल की लत लग जाती है। बच्चों को फोन देने से पहले उसमें अभिभावकीय नियंत्रण लगाना चाहिए, क्योंकि आज इंटरनेट की सामग्रियों के आगे समुद्र भी सूक्ष्म नजर आता है।
अंकित श्वेताभ, दिल्ली।
‘वाटर हार्वेस्टिंग’ प्रणाली को बढ़ावा देने की जरूरत
पानी के संरक्षण के क्रम में ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ प्रणाली के बारे में सब जानते हैं, मगर व्यावहारिक रूप से पर बहुत कम काम हुआ है। हर साल कभी कम तो कभी ज्यादा बरसात होती है, मगर शहरों-कस्बों में बरसात का पानी नालियों में ही बहते हुए देखा जाता है। परिणामस्वरूप फिर पूरे साल पानी की किल्लत झेलनी पड़ती है।
गावों में जो तालाब, पोखर खुदाई कार्य करवाया जाता है तो उसमें बरसात का पानी एकत्रित होकर यह जल मानव सहित पशु-पक्षियों के लिए पीने और जमीन के जल-स्तर को ऊपर उठाने में सहायक होता है। शहरों-कस्बों में हजारों मकान, सरकारी भवन आदि होते हैं।
इन भवनों की छत पर जो भी बरसात का पानी बरसता है तो उसे पूर्णरूपेण और आवश्यक रूप से काम में लेने के लिए हर छत के पानी को गली में बिछाई गई पृथक से पाईप लाइन के जरिए शहरों में बनाए गए बड़े मानव निर्मित तालाबों तक पाइप लाइन से जोड़ कर बरसात का पूरा पानी इनमें एकत्रित करके साल भर पीने के काम में लाया जा सकता है।
पीने के पानी की किल्लत वाले शहरों-कस्बों में इस प्रणाली को लागू किया जाना आवश्यक है। जगह-जगह ऐसे मानव निर्मित तालाबों के कारण हरियाली भी नजर आएगी जो आसपास के तापमान को नियंत्रित करने के साथ ही बादलों को अपने आसपास बरसने की स्थितियां भी पैदा करेगी।
अशोक रंगा, बीकानेर।
नदियों की हालत दयनीय
हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां नदियों को मां का दर्जा दिया जाता है। ये वही पवित्र नदियां हैं जिनकी गोद में प्राचीन भारत की सभ्यता फली-फूली थी। लेकिन आज सबसे ज्यादा अपने देश में ही नदियों की हालत दयनीय बनी हुई है। नदियों की सफाई के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपए निर्गत किए जाते हैं, लेकिन नदियों का जीवन-तत्त्व कमजोर होता जा रहा है।
नदियों की ऐसी स्थिति के लिए हम सब भी उतने ही जिम्मेदार हैं। आज भी पाश्चात्य देशों में पर्यावरण और जल संरक्षण बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा है, ताकि संपूर्ण पृथ्वी महफूज रहे।
रूपेश गुप्ता, इंदिरापुरम, गाजियाबाद।
