असम के नागांव के 15 लोगों को भारत छोड़कर बांग्लादेश भेज दिया गया। इन लोंगों को 17 दिसंबर को निष्कासन के आदेश जारी किए गए थे, जिसमें उन्हें 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने को कहा गया था।

इन लोगों में एक महिला अहेदा खातून भी भारत छोड़ जा चुकी है। उनके बेटे आदिलुर जमान ने बताया कि उन्हें एक रात उनकी मां का कॉल आया था। यह कॉल अज्ञात नंबर से व्हाट्सऐप पर किया गया था। अपनी मां से बात करते हुए आदिलुर ने कहा कि उनकी मां को सही नहीं पता कि वह कहां हैं लेकिन वह बांग्लादेश में ढाका में कहीं है।

किसी से फोन मांग कर किया था कॉल

उन्होंने कहा कि उनकी 46 वर्षीय मां अहेदा खातून ने उन्हें किसी से फोन मांग कर कॉल किया था।

इन लोगों का निष्कासन 1950 के आप्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम के आह्वान के तहत किया गया था, यह अधिनियम सात दशकों से अधिक समय पहले अधिनियमित होने के बाद से निष्क्रिय था, लेकिन पिछले साल राज्य सरकार ने एक एसओपी को मंजूरी दी और इस कानून को पुनर्जीवित किया गया।

सुप्रीम कोर्ट में चल रहा केस

प्रशासन की ओर से नागांव के जुरिया गांव की अहेदा खातून को 2019 में एक विदेशी नागरिक घोषित कर दिया। हालांकि 2025 में उन्होंने इसके खिलाफ गुवाहाटी हाईकोर्ट में अपील की, लेकिन अगस्त में कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि उन्होंने इसे उचित समय सीमा के भीतर चुनौती नहीं दी गई। इसके बाद अहेदा खातून को हिरासत में लेकर मटिया ट्रांजिट कैंप भेज दिया गया, जिसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

वह रो रही थी- आदिलुर

आदिलुर ने कहा कि जब तक उन्हें पता चला कि उनकी मां को मटिया कैंप से ले जाया गया तो उसके बाद छह दिनों तक उन्हें अपनी मां की कोई खबर नहीं मिली। “फिर एक रात करीब 11.30 से 12 बजे के आसपास उन्हें एक व्हाट्सऐप कॉल आया, जो उन्होंने किसी से फोन मांगकर किया था। उन्हें मेरा नंबर याद है। मैंने उन्हें पूछा कि वह कहां हैं और बताया कि हम सब उनके लिए परेशान। वह रो रहीं थीं।”

आगे आदिलुर ने कहा कि मां ने कहा, “उन्हें आधी रात एक अनजान जगह पर गाड़ी से उतार दिया गया और वह दो दिनों तक एक जंगल में पैदल चलीं। उन्होंने कई रातें रेलवे प्लेटफॉर्म और ट्रेनों में बिताए जब तक कि एक ई-रिक्शा चालक ने उनकी मदद नहीं की। उन्होंने बताया कि उनका परिवार उन्हें अपने घर में पनाह दे रहा है।”

आदिलुर ने कहा, “वह अपने जीवन में कभी भी नागांव (उनके स्थानीय जिला मुख्यालय) तक अकेले नहीं गई है।” जुरिया के एक स्थानीय बाजार में आदिलुर सब्जियां बेचते हैं।

बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल ने दी जानकारी

भारत से निकाले गए लोगों में से एक हुसैन अली भी थे उनके पड़ोसी मुस्तफा अली ने बताया कि हुसैन अली को बॉर्डर पर ले जाने के लगभग एक सप्ताह बाद उनके परिवार को फोन आया था।

मुस्तफा अली ने कहा, “एक अज्ञात व्यक्ति ने वीडियो कॉल करके हुसैन की पत्नी जहूरा से बात की। उसने बताया कि वह बांग्लादेश सीमा सुरक्षा बल का अधिकारी है। वीडियो कॉल पर हुसैन को दिखाते हुए उन्होंने कहा कि हुसैन ने ही उन्हें यह नंबर दिया था और हमसे पूछा कि क्या वाकई वही हुसैन का पति है। जब हमने पुष्टि की, तो उन्होंने बताया कि हुसैन बांग्लादेश के फुलटोला नाम की जगह पर है और रेलवे लाइन के पास स्थानीय लोगों ने उसे अकेला पाया था। स्थानीय लोगों ने उसे रेलवे पुलिस के हवाले कर दिया।” मुस्तफा ने आगे बताया, “हमें हुसैन से बात करने की अनुमति नहीं दी गई और अभी तक हमें उससे यही एकमात्र जानकारी मिली है।”

एक अन्य परिजन रतुर रहमान को भी अपने पिता नजरुल इस्लाम की कोई जानकारी नहीं। नजरुल को 2018 में ही विदेशी घोषित कर दिया गया था। इस मामले में पुनर्विचार याचिका वर्तमान में गुवाहाटी हाईकोर्ट में विचाराधीन है और अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।

रतुर रहमान ने कहा, हमारे वकील ने हमें बताया कि जब मामला कोर्ट में आएगा तो हमें उनके बारे में कुछ जानकारी जरूर मिल सकती है।

कोर्ट में है मामला

अहेदा खातून का केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे वकील अदील अहमद ने कहा कि वे शीतकालीन अवकाश के बाद कोर्ट के फिर से खुलने का इंतजार कर रहे। उन्होंने कहा, “उनका मामला कोर्ट में है और हमें 5 जनवरी को, जिस दिन कोर्ट फिर से खुलेगी, मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अनुमति मिल गई है।”

बता दें कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस हफ्ते दोहराया कि किसी विदेशी घोषित व्यक्ति के पास मौजूद कानूनी विकल्पों को उनकी सरकार 1950 के एक्ट का हवाला देकर हटाना चाहती है, जो आवेदक को चुनौती देने से पहले उसे आदेश के एक सप्ताह के भीतर निष्कासन की अनुमति देता है।

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