कोरोना और धंधा
अन्य जगहों से आने वालों के लिए कोरोना की नकारात्मक रिपोर्ट की अनिवार्यता कुछ लोगों के लिए एक नया धंधा बना गया है। रेपिड जांच की नकारात्मक रिपोर्ट को राज्य मान्यता नहीं दे रहे हैं। वे आरटीपीसीआर या अन्य जांच के बाद मिलने वाली नकारात्मक रिपोर्ट के बाद ही प्रदेश की सीमा में प्रवेश की इजाजत दे रहे हैं। ऐसे में निजी लैब से नकारात्मक रिपोर्ट लाने के एवज में कारोबारियों और ठेकेदारों से मनमाना शुल्क वसूल कर यह सुविधा दे रहे हैं।

खास बात यह है कि जुगाड़ के जरिए जारी होने वाली ऐसी नकारात्मक जांच रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की जा रही है। इससे ना केवल कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ने की आशंका बढ़ रही है, बल्कि जांच रिपोर्ट भी संदेह के घेरे में आ रही है। कोरोना काल में इसी तरह पहले निजी कंपनियों में काम करने वालों के लिए कोविड-19 की नकारात्मक रिपोर्ट मांगी गई थी। इसके लिए अस्पताल में काम करने वाले सफाई कर्मियों ने खूब मनमानी काटकर नकारात्मक रिपोर्ट के कागज, रुपए लेकर बांटे थे। सुविधा शुल्क के रूप में रुपए लेकर कोविड-19 के नकारात्मक पर्चे जारी कराए थे।

अखबार में नाम
राजनेता चाहे छोटा हो या बड़ा हर कोई अखबारों में छपने के लिए हर तरकीब अपनाते हैं। कई बार देखने को मिलता है कि वे छोटे-मोटे मुद्दे को बड़ा कर पेश करते हैं ताकि उनका नाम भी समाचार पत्रों में ज्यादा छपे और वह अपने प्रदेश अध्यक्ष या फिर पार्टी के आला कमान के समाने कह सकें कि वह हर मुद्दे पर जानकारी रखते हैं। पर दिल्ली के एक प्रदेश अध्यक्ष ऐसे हैं, जो हमेशा केवल अपने नाम से बयान जारी करते है। इसको लेकर उनकी पार्टी के अंदर आवाज उठने लगी है।

कई नेता तो यहां तक कहने लगे हैं कि वह अपने अलावा किसी अन्य का बयान तक मीडिया को नहीं भेजते, ताकि मीडिया उन नेताओं का नाम भी छाप सके। हालांकि, अपने बयान जारी करते वक्त प्रदेश अध्यक्ष इस बात का ध्यान जरूर रखते हैं कि किन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हालांकि, अभी तक इसका विरोध दबे जुबान किया जा रहा है। पर यदि यही हाल आगामी दिनों में भी रहा तो हो सकता है कि कुछ लोग उनके खिलाफ खुल कर बयानबाजी करने लगें।

भारी पड़ी मटरगश्ती
बीते दिनों दिल्ली सरकार के एक विभाग में कुछ कर्मचारियों की अक्सर होने वाली मटरगश्ती एक दिन उन पर भारी पड़ती दिखी। दिल्ली विधानसभा के नजदीक मौजूद दिल्ली सरकार के इस महकमें में कर्मचारियों के नदारद रहने की खबर जैसे नए निदेशक को मिली, वे औचक निरीक्षण को निकल पड़े। कई कर्मचारी गायब मिले। पता चला पहले भी ऐसा ही होता था, लेकिन निदेशक का औचक निरीक्षण तो पहली बार हुआ था।

बस क्या था गायब कर्मचरियों को जैसे ही फोन पर यह खबर मिली वो दफ्तर की ओर भागे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। सबका वेतन काटने और सफाई देने वाला आदेश निकल चुका था। निदेशक कड़े तेवर के हैं, लिहाजा युनियनों की फरियाद भी धरी की धरी रह गई। किसी ने ठीक ही कहा-कर्मचारियों पर उनकी मटरगश्ती भारी पड़ गई।
बेदिल