West Bengal Election News: पश्चिम बंगाल में विधानसभा से पहले भारतीय जनता पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है और इसी क्रम में उसने तैयारियों का प्रबंधन करने के लिए अन्य राज्यों से कई अनुभवी नेताओं को शामिल किया है। पिछले एक महीने में बीजेपी ने बंगाल यूनिट में मंडल से लेकर जिला स्तर तक आंतरिक मतभेदों को सुलझाने और चुनाव तैयारियों के प्रबंधन के लिए अन्य राज्यों से कई अनुभवी वरिष्ठ नेताओं को प्रवासी सदस्य के रूप में तैनात किया है।

इन प्रवासी सदस्यों में उत्तर प्रदेश के मंत्री जेपीएस राठौर, उत्तराखंड के मंत्री धन सिंह रावत, राजस्थान बीजेपी किसान मोर्चा के अध्यक्ष कैलाश चौधरी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री सुरेश राणा, हरियाणा बीजेपी के महासचिव संजय भाटिया और कर्नाटक के पूर्व मंत्री सीटी रवि शामिल हैं। चूंकि, ये नेता मुख्य रूप से हिंदी बोलते हैं, इसलिए उनके साथ स्थानीय नेता भी होते हैं। बंगाल में तैनाती के बाद से, इन नेताओं ने मंडल, विधानसभा और जिला यूनिट्स में पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठकें की हैं।

राठौर को सौंपी गई बंगाल की 35 सीटों की जिम्मेदारी

जेपीएस राठौर को 2017 और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों के प्रबंधन का अनुभव है। उनको पश्चिम बंगाल की 35 विधानसभा सीटें सौंपी गई हैं। उनके अधीन पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कोंटाई और तामलुक और पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के घाटाल और मेदिनीपुर शहर आते हैं। राणा उत्तर 24 परगना जिले के बैरकपुर, बारासात और बोंगांव की देखरेख कर रहे हैं। राणा पश्चिमी यूपी के शामली जिले से हैं और उन्होंने हरियाणा, दिल्ली , त्रिपुरा और मध्य प्रदेश में पार्टी के चुनावी प्रयासों का नेतृत्व किया है। उनके पास 28 विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी है और हाल ही में उन्होंने संदेशखाली का दौरा किया, जहां 2024 में स्थानीय टीएमसी नेताओं पर यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद एक बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था।

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भाटिया को आरामबाग उपमंडल और श्रीरामपुर सहित हुगली जिला और हावड़ा शहर सौंपा गया है, जबकि चौधरी को कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी और उत्तरी बंगाल के अन्य जिलों में पार्टी की तैयारियों की निगरानी का जिम्मा दिया गया है। ये सभी नेता राज्य के प्रभारी बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल को रिपोर्ट करते हैं।

एक प्रवासी नेता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “अपने-अपने राज्यों के अनुभव के आधार पर हम राजनीतिक और संगठनात्मक प्रबंधन पर ध्यान दे रहे हैं। हम संगठनात्मक अभियानों और कार्यक्रमों की भी देखरेख कर रहे हैं और उन मतदान केंद्रों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जहां हम कमजोर हैं। हालांकि, हमारा मुख्य ध्यान स्थानीय पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच मतभेदों को सुलझाने पर है।”

इस महीने की शुरुआत में, पार्टी के राज्य स्तरीय नेताओं के साथ हुई बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विधानसभा चुनावों से पहले सभी मतभेदों को भुलाने का निर्देश दिया था। बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों ने इस बैठक को राज्य स्तर पर पार्टी के पुराने और नए नेतृत्व के बीच की खाई को पाटने की कोशिश बताया। हालांकि, टीएमसी ने पिछली बार बीजेपी को बाहरी लोगों की पार्टी के रूप में पेश करने में सफलता हासिल की थी और इस बार भी वही कहानी दोहरा रही है, ऐसे में बीजेपी इसका क्या जवाब देती है, यह देखना बाकी है।

‘प्रवसई सदस्य’ क्या कर रहे हैं?

अपनी जिम्मेदारी के बारे में पूछे जाने पर एक प्रवासी नेता ने कहा, “चूंकि हम स्थानीय नहीं हैं, इसलिए हम राज्य के किसी भी पार्टी नेता के प्रति पक्षपाती नहीं हैं। वे हमसे खुलकर बात कर सकते हैं और अपनी समस्याओं और मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं। अपने अनुभव के आधार पर, हम बैठकों में मुद्दों को सुलझाते हैं और जटिल मुद्दों को नोट कर लेते हैं ताकि वरिष्ठों से उन पर चर्चा कर सकें। हम उन नेताओं को एक साथ ला रहे हैं जिनके बीच मतभेद हैं और उन्हें पार्टी के हित में अपने विवाद खत्म करने के लिए मना रहे हैं क्योंकि पार्टी को सत्ता में लाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

एक अन्य नेता ने कहा पार्टी का अनुमान है कि चुनाव जीतने के लिए उसे अपने वोट शेयर में 5% की बढ़ोतरी करनी होगी, जो कहना आसान है, करना मुश्किल। 2021 में बीजेपी का वोट शेयर 37.97% था, जबकि तृणमूल कांग्रेस का 48.02% था। टीएमसी के वोट शेयर में से बीजेपी को 5% का लाभ मिलने पर दोनों पार्टियां बराबरी पर आ जाएंगी। पार्टी इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। बीजेपी संगठनात्मक रूप से 2026 में 2021 की तुलना में ज्यादा मजबूत है। साथ ही, टीएमसी सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी भावना भी बढ़ी है।

आंतरिक कलहों को संभालने और समस्याओं को सुलझाने के अलावा, इन नेताओं को कम अंतर वाले निर्वाचन क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जहां पार्टी के पास टीएमसी से सीटें बरकरार रखने या छीनने का मौका है। उदाहरण के लिए, कूच बिहार का दिन्हाटा ऐसा ही एक निर्वाचन क्षेत्र है, जिसे बीजेपी ने 2021 में 57 वोटों से जीता था। बता दें कि प्रधानमंत्री 2026 के विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा से पहले पश्चिम बंगाल में कम से कम सात रैलियों को संबोधित कर सकते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…