प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने मंगलवार को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर वैदिक मंत्रोच्चार और ”जय श्री राम” के नारों की गूंज के बीच भगवा ध्वज फहराया। इस अनुष्ठान के साथ ही मंदिर का निर्माण औपचारिक रूप से पूरा हो गया। इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्वलित रही। जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं। इस ख़ास कार्यक्रम में मंदिर आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी आमंत्रित किया गया।

इनमें से एक अनिल कुमार 26 साल के थे और मिर्जापुर में भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष थे, जब उन्होंने 1992 में राम मंदिर आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल गए। कुमार प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भी मौजूद थे लेकिन भोजन परोसने वाले स्वयंसेवक के रूप में। वह अपने जिले के 35 लोगों के समूह का हिस्सा हैं, जिनकी आयु 50-60 वर्ष के बीच है और सभी का मंदिर आंदोलन से कुछ न कुछ संबंध है।

राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी किया गया आमंत्रित

लखनऊ में राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत 50 वर्षीय मृदुल शुक्ला ने कहा कि कि छात्र संघ नेता के रूप में उन्हें विहिप पदाधिकारियों द्वारा इस्लामीकरण विरोधी सेना का कमांडर चुना गया था ताकि तत्कालीन मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी सरकार को अयोध्या को “मक्का” में बदलने से रोका जा सके।

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मृदुल ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, मैंने एक वैज्ञानिक के रूप में और विज्ञान के क्षेत्र में एक गैर-सरकारी संगठन के साथ काम करते हुए, एक दूसरा जीवन शुरू किया। हालाँकि, संघ की विचारधारा हमेशा मेरे दिल के करीब रही। जो लोग हमारे साथ थे, उनमें से कुछ अब नहीं रहे।” शुक्ला कहते हैं कि 2020 में मंदिर में काम शुरू होने से पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। मुझे यहाँ आमंत्रित अतिथि के रूप में उपस्थित होकर खुशी हो रही है।”

अतिथियों ने जताया आभार

57 वर्षीय अनिल कुमार सिंह 1992 में भाजपा की मिर्जापुर युवा शाखा के ज़िला प्रमुख थे और आज मिर्जापुर में आरएसएस के ‘संपर्क ज़िला प्रमुख’ हैं। वे भी पिछले दो राम मंदिर कार्यक्रमों में स्वयंसेवक के तौर पर शामिल हुए थे। उन्होंने कहा, “ज़िंदगी का चक्र पूरा हो गया है। हमने युवा कारसेवकों के रूप में मंदिर आंदोलन में हिस्सा लिया था. मैं 1992 में जेल भी गया था।” उन्हें उम्मीद है कि मथुरा और काशी मंदिर विवाद भी जल्द ही सुलझ जाएगा।

सोनभद्र के जनार्दन वैस्वरन 1992 के राम मंदिर आंदोलन में अन्य लोगों के साथ भाग लेने के समय वे मात्र एक इंटरमीडिएट थे। उन्होंने कहा, “हमें एक फ़ोन कॉल के ज़रिए निमंत्रण मिला, फिर एक एसएमएस, एक पत्र और आख़िरकार राम जन्मभूमि ट्रस्ट की ओर से एक कार्ड आया। हम इसे हमेशा संजोकर रखेंगे।”

आमंत्रित सूची में विभिन्न समुदायों और वर्गों का प्रतिनिधित्व

बताया जा रहा है कि आरएसएस ने 6 महीने की कड़ी मेहनत के बाद अतिथियों को चुना है और इसके लिए ज़मीनी कार्यकर्ताओं और उन लोगों को चुना है जिन्होंने या तो राम मंदिर आंदोलन में योगदान दिया या अपने क्षेत्रों या समुदायों में इस आंदोलन को फैलाने में मदद की। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। राम जन्मभूमि विवाद में मुस्लिम पक्ष के मुख्य वादी इकबाल अंसारी भी मौजूद रहे।

सूत्रों ने बताया कि आमंत्रित सूची में विभिन्न समुदायों और वर्गों का प्रतिनिधित्व है – किन्नर, कुम्हार, लोधी, यादव, धोबी, पासी, वाल्मीकि, रविदास आदि। अनुसूचित जनजाति के आमंत्रितों में उत्तर प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, राजस्थान और तमिलनाडु के लोग भी शामिल हैं । सूत्रों का कहना है कि सूची में शामिल सभी लोगों का आरएसएस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ाव रहा है। पढ़ें- राम मंदिर से बोले पीएम मोदी- यज्ञ की पूर्णाहुति है