बयालीस साल से जिंदगी मेरे लिए अभिशाप बन गई है। यह कहना है उस गुनहगार का जिसने अपनी पाशविक हरकत से नर्स अरुणा शानबाग की जिंदगी को चार दशक का नरक बना दिया। वह दोषी आज भी जिंदा है और राजधानी दिल्ली से कुछ दूर हापुड़ के एक गांव में रहता है। अपने दुष्कर्म को याद करते हुए वह कहता है कि : मैंने मांस खाना छोड़ दिया। बीड़ी, शराब पीने जैसी बुरी आदतें छोड़ दीं। सजा मिलने के पहले मेरे एक बेटी थी। जब मैं जेल में था, वह मर गई। वह मरी इसलिए कि मैंने पाप किया था। जेल से छूटने के बाद कई साल तक मैं अपनी पत्नी के पास तक नहीं गया। जेल से निकलने के चौदह साल बाद मेरे बेटा पैदा हुआ था।
अपमान और तानों से भरी अपनी बीती जिंदगी को याद करते हुए सोहनलाल ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा: यह सब अरुणा दीदी के साथ ‘हादसे’ के कारण हुआ। मुझे बहुत पछतावा है। मैं उनसे और अपने भगवान से माफी मांगता हूं।
गांव में मुफलिस जिंदगी काट रहा यह बूढ़ा शख्स जिस हादसे की बात कर रहा है, वह 27 नवंबर, 1973 की रात किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल (मुंबई) में हुआ था। उस रात सोहनलाल नामक के इस सफाईकर्मी ने ‘दीदीजी’ (अरुणा शानबाग) से दरिंदों जैसी हरकत की।
उसके गले को कुत्तों को बांधने वाली जंजीर से कसकर जबरदस्ती की। इस बर्बर हरकत के कारण अरुणा का दिमाग लुंज-पुंज हो गया और जीवन के42 साल उसे जैसे एक ‘मृत्युशैय्या’ पर रहना पड़ा। उसका त्रासद जिंदगी ने देश भर में इच्छा मृत्यु पर एक देशव्यापी बहस चलाई और आखिरकार इस माह की 17 तारीख को उसने इस जहां को अलविदा कर दिया।
अपने जघन्य अपराध के लिए सोहनलाल को सात साल की कैद मिली जो उसने पुणे के येरवडा जेल में काटी। रिहाई के बाद वह दिल्ली आ गया और एक अस्पताल में काम करने लगा। उसके बारे में कहा गया कि टीबी से उसकी मौत हो चुकी है। कुछ लोगों ने उसे एड्स होने की बात की।
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लेकिन इन सालों के बीच वह अपने पुश्तैनी गांव दादूपुर में रहा और बाद में अपनी ससुराल पारपा में जाकर रहने लगा। ये दोनों ही गांव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हैं। पेट पालना के लिए वह मजूरी करता रहा। अब वह अपने को 62 साल का बताता है, जबकि उसके बेटे का कहना है कि वह 72 साल का है।
असल में कुछ दिनों पहले ही यह खबर आई कि सोहनलाल जिंदा है और वह हापुड़ तहसील के पारपा गांव में रह रहा है। कुछ लोगों ने बताया कि वह राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम दादरी (एनटीपीसी) में बीते 16 साल से मजदूरी कर रहा है। बीते कुछ दिनों से टीवी चैनल और अखबार के पत्रकार सोहनलाल को तलाशने में लगे थे। एक टीवी चैनल से बातचीत में उसने कहा कि उसे अपने गुनाह की सजा मिल चुकी है। उसका कहना है कि उसने अरुणा के साथ बलात्कार नहीं किया था। पुलिस ने भी बलात्कार का मामला नहीं बनाया था।
बीते दिनों मुंबई के मराठी दैनिक ‘सकाल’ के प्रतिनिधि ने भी पारपा गांव जाकर सोहनलाल से मुलाकात की। अखबार ने शुक्रवार को विस्तार से इसकी रपट प्रकाशित की है। पहले सोहनलाल ने बताया था कि उसे अरुणा के निधन की खबर दिल्ली के एक रिश्तेदार ने मोबाइल पर सुनाई थी। बाद में उसने कहा कि एक पत्रकार ने यह सूचना दी। किसी ने उससे कहा, उस पर नए सिरे से आरोप तय होकर मुकदमा चलाया जा सकता है। इस अंदेशे से वह बुरी तरह से डरा हुआ है। सोहनलाल रक्तचाप का शिकार है। उसे एक आंख से दिखाई नहीं देता है। वह मजदूरी कर महीने में चार हजार रुपए कमाता है।
अरुणा शानबाग का जिक्र छिड़ते ही वह कहता है,‘अब क्या है… कहानी खत्म हुई। अब क्या पूछेंगे आप…मैं तो बस अपना बचा हुआ वक्त काट रहा हूं। मजदूरी करता हूं।’
सोहनलाल गांव में अपने परिवार के साथ रहता है। उसके परिवार में नौ सदस्य हैं। उसकी पत्नी विमला पुणे की रहने वाली है। उसके किशन और रविंदर नाम के दो बेटे हैं। उनकी शादियां हो चुकी हैं। सोहनलाल दोनों बेटों के साथ मेहनत मजदूरी करता है। अरुणा के साथ हुई जघन्य घटना के बाद रविंदर का जन्म हुआ था। सात साल की सजा काटने के बाद सोहनलाल जिस दादूपुर गांव में रहा था, वहां उसे लोगों ने बहुत परेशान किया। सोहनलाल के कुकर्म के बाद बनी स्थिति के चलते बेटे ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाए और परिवार अभी भी गरीबी में दिन बिता रहा है। सोहनलाल की एक बेटी की शादी होनी अभी बाकी है।
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किशन और रविंदर का कहना है कि उनके पिता के कुकर्म के चलते उनका जीवन तबाह हो गया। रिश्तेदारों ने साथ छोड़ दिया। मां ने विपत्तियों से लड़ते हुए उनका पालन पोषण किया।
गांव में निकलने में उन्हें शर्म आती है। परिस्थितियों के आगे उन्होंने हार मान ली है। मगर अरुणा शानबाग के साथ घटी घटना के बारे में उन्होंने अपने पिता से कभी कुछ नहीं पूछा, ‘उन्होंने मजदूरी करके हमें बड़ा किया। हमारा पेट पाला। जितना बन सका पढ़ाया। अब उनकी जिंदगी के पन्ने हम क्यों पलटें?’ बेटा किशन कहता है। जबकि गांव प्रधान रामपाल सिंह के मुताबिक,‘सोहनलाल की हालत बहुत बुरी है। वह हर रोज मरता है और अपने किए की सजा भुगत रहा है।’
गले में रुद्राक्ष की माला पहने और पर्स में अपने गुरु की तस्वीर रखने वाला सोहन लाल कहता है कि इस हफ्ते जब सकाल टाइम्स का एक पत्रकार उसे खोजते हुए पापरा आया तो उसे अरुणा शानबाग की मौत के बारे में जानकारी मिली। गांव में एक हफ्ते से बिजली नहीं थी और छोटे से घर में रखा टीवी काम नहीं कर रहा था। उसके परिवार वाले अखबार नहीं पढ़ते इसलिए खबर की कोई जानकारी नहीं थी।
वह कहता है: मैं सुबह काम के लिए घरसे निकल जाता हूं और रात आठ बजे तकलौटता हूं। रोज की कमाई 261 रुपए होती है। साइकिल चलाकर मैं 25 किलोमीटर दूरकाम पर जाता हूं। अखबार पढ़ने का वक्त ही कहां है।
वह इन खबरों को बकवास बताता है कि जेल काटने के बाद उसने किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल मे फिर काम किया था। ‘मेरे बेटे ने मुझे बताया कि मैंने उसे (अरुणा) को मारने का प्रयास किया था… इस घटना के बाद दस साल तक मैं ढंग से नहीं सो सका। ऐसे हादसे के बाद कैसे मुमकिन है कि कोई उसी अस्पताल में जाकर काम करता।’
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मुंबई से मिली खबर के अनुसार, पुलिस ने कहा है कि सोहनलाल के खिलाफ नए सिरे से आरोप लगाने की कोई जरूरत नहीं है। मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने उसे 1973 में शानबाग की हत्या के प्रयास और चोरी के आरोप में पुणे से गिरफ्तार किया गया था। अस्पताल प्रशासन ने वाल्मीकि के खिलाफ भोईवाड़ा पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया था। वहां से यह मामला अपराध शाखा को सौंप दिया गया था। सोहनलाल को मुंबई की एक सत्र अदालत ने हत्या के प्रयास और चोरी के आरोप में सात साल की सजा सुनाई थी।
मुंबई पुलिस के संयुक्त आयुक्त (अपराध) अतुलचंद्रा कुलकर्णी ने कहा, ‘हत्या का आरोप लगाने से जोखिम दो गुना हो जाएगा, क्योंकि दोषी को पहले ही सजा हो चुकी है और वह अपनी सजा काट चुका है। हत्या के प्रयास के मामले में हत्या की धाराएं लगाने के लिए जरूरी है कि मौत की वजह वह अपराध ही हो। इस मामले में महिला 42 साल तक जिंदा रही, ऐसे में यह मामला अदालत में टिक नहीं पाएगा।’

