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अरुणा शानबाग: बहुत गहरा है अंधेरा पर कुछ जुगनू चमक रहे हैं

अरुणा शानबाग की कहानी पुरुष लोलुपता की कहानी है। यह कहानी इस देश में कामकाजी महिलाओं की असुरक्षा और भय की कहानी है। लेकिन यह कहानी करुणा, उदारता और सेवाभाव की कहानी भी है। यह कहानी बताती है कि तमाम गड़बड़ियों के बावजूद अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।

Author May 19, 2015 10:38 AM
1973 में रेप की शिकार अरुणा का मुंबई के अस्पताल में हुआ निधन

अरुणा शानबाग की कहानी पुरुष लोलुपता की कहानी है। यह कहानी इस देश में कामकाजी महिलाओं की असुरक्षा और भय की कहानी है। लेकिन यह कहानी करुणा, उदारता और सेवाभाव की कहानी भी है। यह कहानी बताती है कि तमाम गड़बड़ियों के बावजूद अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।

अरुणा की कहानी बताती है कि महिलाओं को अपने कार्यस्थलों पर किस तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ता है। अरुणा की कहानी 42 साल पहले की कहानी है। मगर आज भी हालात जस-के-तस हैं। आज भी नौकरीपेशा महिलाओं को हमेशा किसी अनहोनी होने का भय सताता रहता है। वे किसी भी पल इस भय से आजाद नहीं हैं।

मगर अरुणा की दुखांत कहानी में कहीं उजला पहलू भी है। उजला पहलू उम्मीद की किरण दिखाता है कि अभी सब कुछखत्म नहीं हुआ है। अंधेरा गहरा है तो क्या हुआ, कुछ जुगनू चमक रहे हैं। और कुछ जुगनू साथ मिल जाएं तो हाथ सूझने लायक उजाला तो कर ही सकते हैं। बीते 42 सालों से केईएम अस्पताल के अरुणा के सहकर्मियों ने परोपकार और परदुखकातरता की जो मिसाल पेश की है, उसका कोई सानी नहीं है।

आमतौर से अस्पतालों के बारे में हमारे विचार बहुत अच्छे नहीं होते हैं। उन्हें लूट का केंद्र माना जाता है। वे ऐसी जगह के रूप में देखे जाते हैं, जहां लोगों को अपने सदस्यों के शव लेने के लिए भी पैसा देना पड़ता है। मगर इन्हीं अस्पतालों में दयालु डॉक्टर और नर्सें भी हैं। उनकी कहानियां गाहेबगाहे ही लोगों के सामने आती हैं। जब ऐसी कहानियां सामने आती हैं तो आंखें भीग जाती हैं।

अरुणा के इन सहकर्मी डॉक्टरों और नर्सों ने 42 साल तक हड्डियों का पिंजर बनी एक देह की अथक सेवा की और कभी उफ नहीं की। नर्सें बाकायदा अरुणा को नहलाती थीं। कपड़े पहनाती थीं। उनके बाल संवारती थीं। मेकअप करती थीं। इस दौरान वे अरुणा की पसंद-नापसंद को जानने समझने लगी थीं। अरुणा को मिठाई पंसद थी।

तो त्यौहार पर उन्हें मिठाई खिलाई जाती थी। मछली पसंद थी, तो उनके लिए मछली बनाई जाती थी। जून के पहले सप्ताह में अरुणा 68 वां जन्मदिन मनाने जा रही थीं। अस्पताल में अरुणा का जन्मदिन मनाया जाता था। यह अद््भुत लगाव था। इसी लगाव ने इन नर्सों को तब विरोध के लिए खड़ा कर दिया था जब 80 के दशक में अरुणा को अस्पताल से हटाने की मुहिम शुरू की गई थी। मगर अरुणा की सहकर्मियों ने इस कोशिश को सफल नहीं होने दिया।

42 साल तक कोमा में कोई रहे तो परिवार के अपने लोग भी मुंह मोड़ने लगते हैं। मगर केईएम अस्पताल में अरुणा के सहकर्मियों ने कभी अरुणा की देखभाल की उपेक्षा नहीं की। जबकि वे आसानी से ऐसा कर सकते थे। जब पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पिंकी विरानी ने अदालत में अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की याचिका दायर की, तो अरुणा के अस्पताल के सहकर्मी उसके विरोध में खड़े हो गए।

यह अद्भुत द्वंद्व था। एक ओर पिंकी विरानी उस अरुणा की मदद करना चाहती थी, जो रात दिन दर्द से लड़ रही थी, मगर उसे व्यक्त नहीं कर पा रही थी। दूसरी ओर अरुणा के सहकर्मी थे जो भावनात्मक लगाव के चलते उसके लिए कृत्रिम मृत्यु नहीं चाहते थे। लिहाजा इस द्वंद्व में बाकायदा विरानी के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे भी नर्सों ने लगाए। हमारे समाज में दूसरों के दुख से दुखी होनेवालों की ऐसी मिसाल शायद ही देखने को मिलेगी।

अरुणा शानबाग की कहानी यह भी बताती है कि 42 साल तक यौन प्रताड़ना के दर्द की सजा सात साल होती है। यह पाशविक कृत्य करनेवाला सोहनलाल चोरी और हत्या की कोशिश का अपराधी तो पाया जाता है, मगर बलात्कार का अपराधी साबित नहीं होता।

घटना की रात अरुणा मासिक धर्म के दौर से गुजर रही थी इसलिए सोहनलाल ने उसके साथ अप्राकृतिक मैथुन किया और बलात्कार के आरोप से बच निकला। सात साल की सजा काटने के बाद अत्याचार करने वाला तो सामान्य जीवन जी रहा था, जबकि जिस पर अत्याचार हुआ उसके जीवन में नारकीय यातना का दौर खत्म नहीं हुआ था। लिहाजा इस विसंगति के विरोध में भी तब लोग खड़े हुए थे।

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