अंकिता भंडारी (Ankita Bhandari) हत्याकांड एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में है। इस बार वजह सिर्फ पुराना मामला नहीं, बल्कि बीजेपी के सीनियर नेताओं पर लगे ताजा आरोप हैं। एक ऑडियो क्लिप सामने आने के बाद यह दावा किया जा रहा है कि अंकिता से “स्पेशल सर्विस” की मांग करने वाला वीआईपी कोई और नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दल का बड़ा चेहरा था। इन आरोपों के बाद राज्य की पुष्कर सिंह धामी सरकार पर कार्रवाई का दबाव तेजी से बढ़ा है और चार जनवरी को बड़े विरोध प्रदर्शन की आहट से सरकार की बेचैनी साफ दिख रही है।
धामी सरकार क्यों डरी है?
नए साल की शाम को उत्तराखंड के कई हिस्सों में कैंडल मार्च निकाले गए। अंकिता की याद में हुए इन मार्चों में सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि कई राजनीतिक और सामाजिक संगठन भी शामिल हुए। पौड़ी गढ़वाल के पैठानी से लेकर देहरादून तक माहौल गर्म है। सरकार को डर है कि यह आंदोलन चार जनवरी को मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच सकता है, जहां बड़े प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। बीजेपी नेताओं पर सीधे आरोप लगने से मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सियासी संकट का रूप ले चुका है।
बीजेपी पर क्या आरोप लगे?
विवाद की जड़ में पूर्व बीजेपी विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सानवार का दावा है। उन्होंने कहा कि अंकिता से यौन संबंध की मांग करने वाला वीआईपी एक सीनियर नेता था, जिसे “गट्टू” कहा जाता था। सानवार ने एक ऑडियो क्लिप जारी की, जिसमें कथित तौर पर राठौर उस वीआईपी की पहचान बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम और एक अन्य वरिष्ठ नेता के रूप में करते सुनाई देते हैं। हालांकि बाद में सुरेश राठौर ने पलटवार करते हुए कहा कि यह ऑडियो एआई-जेनरेटेड है और पार्टी को बदनाम करने की साजिश है। दुष्यंत गौतम ने भी किसी तरह की भूमिका से इनकार किया है। बावजूद इसके, इन आरोपों ने पुराने वीआईपी एंगल को फिर से जिंदा कर दिया है।
चार जनवरी को क्या होने वाला है?
चार जनवरी को देहरादून में मुख्यमंत्री आवास पर बड़े विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया गया है। इस प्रदर्शन में अंकिता का परिवार, उत्तराखंड महिला मंच जैसे नागरिक संगठन और कई राजनीतिक दल शामिल होंगे। सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने भी “देहरादून चलो” आंदोलन में भागीदारी की घोषणा की है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि पूरे मामले की सीबीआई जांच कराई जाए और वीआईपी एंगल की निष्पक्ष जांच हो। सरकार को आशंका है कि यह आंदोलन विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
अब तक इस मामले में क्या हुआ?
19 साल की अंकिता भंडारी वनंतरा रिजॉर्ट (Vanantara resort) में काम करती थीं। आरोप है कि रिजॉर्ट के मैनेजर पुलकित आर्य ने एक वीआईपी को “स्पेशल सर्विस” देने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी। पुलकित आर्य, पूर्व बीजेपी नेता विनोद आर्य का बेटा है। अंकिता का शव 24 सितंबर 2022 को लापता होने के छह दिन बाद ऋषिकेश की एक नहर से मिला था।
हत्या के बाद विनोद आर्य को पार्टी से निकाल दिया गया था। कोर्ट ने तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन जांच में वीआईपी एंगल शामिल नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने संकेत दिया था कि रिजॉर्ट में एक वीआईपी की मौजूदगी थी और अंकिता आरोपियों के अश्लील प्रस्तावों से परेशान थी।
जांच के दौरान सबूतों के नष्ट होने के भी आरोप लगे। घटना के बाद रिजॉर्ट में अंकिता के कमरे पर बुलडोजर चला दिया गया। उसका फोन, बेडशीट और मुख्य आरोपी का फोन बरामद नहीं हो पाए। सीबीआई जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक याचिकाएं दायर हुईं, लेकिन उन्हें खारिज कर दिया गया।
पीड़ित के परिवार ने क्या कहा?
अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी का कहना है कि वे शुरू से ही वीआईपी की भूमिका की बात करते रहे हैं। उनका साफ कहना है कि जब तक सरकार सीबीआई जांच की सिफारिश नहीं करती, आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि नए आरोपों के सामने आने के बाद अंकिता की मां सोनी देवी की तबीयत बिगड़ गई है, लेकिन परिवार को उम्मीद है कि इस बार ताकतवर लोगों को भी कटघरे में लाया जाएगा। परिवार का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ अंकिता के लिए नहीं, बल्कि उन तमाम लड़कियों के लिए है, जो काम की तलाश में घर से निकलती हैं और सत्ता के संरक्षण में बैठे लोगों की शिकार बन जाती हैं।
