उच्चतम न्यायालय में बुधवार को एजीआर मुद्दे पर सुनवाई चल रही थी। ये सुनवाई न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली पीठ द्वारा की जा रही थी। इस दौरान टेलिकॉम कंपनियों के बकाये राशि के फिर से मुल्यांकन करने के सरकार के प्रस्ताव पर न्यायमूर्ति मिश्रा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पर भड़क गए। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने टेलिकॉम कंपनियों के बकाये राशि के फिर से मुल्यांकन के लिए एक प्रप्रोजल दिया है। इसपर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा केंद्र सरकार के इस प्रपोजल पर नाराज हो गए और कहा कि ‘हमें मूर्ख समझा है क्या?’
न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा के नेतृत्व वाली इस पीठ में न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूर्ति एम आर शाह भी थे। पीठ ने एजीआर के मुद्दे पर लगातार समाचार पत्रों में प्रकाशित हो रहे लेखों पर नाराजगी वयक्त की और कहा कि इन सभी दूरसंचार कंपनियों के प्रबंध निदेशकों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जायेगा और भविष्य में समाचार पत्रों में ऐसे किसी भी लेख के लिये उन्हें न्यायालय की अवमानना का दोषी ठहराया जायेगा।
पीठ ने दूरसंचार कंपनियों को एजीआर की बकाया राशि का भुगतान 20 साल में करने की अनुमति देने के लिये केन्द्र के आवेदन पर विचार करने से इंकार कर दिया। पीठ ने कहा कि इस आवेदन पर दो सप्ताह बाद विचार किया जायेगा। पीठ ने सारे घटनाक्रम पर नाराजगी व्यक्त करते हुये कहा कि दूरसंचार कंपनियों द्वारा एजीआर के स्व-मूल्यांकन की अनुमति देकर हम न्यायालय के अधिकारों का अतिक्रमण करने की इजाजत नहीं दे सकते।
#AGR matter being heard by a bench led by Justice Arun Mishra: “Are we fools?” the judge asks SG Tushar Mehta while coming down heavily on the Govt for their proposal to reassess the dues owed by the telecom companies, incl #Vodafone & #Airtel |@News18Courtroom
— Utkarsh Anand (@utkarsh_aanand) March 18, 2020
पीठ ने कहा कि न्यायालय ने दूरसंचार कंपनियों की दलीलें विस्तार से सुनने के बाद एजीआर के बकाये के मुद्दे का निबटारा किया है और उस समय सरकार ने ब्याज और जुर्माने की राशि के लिये जोरदार दलीलें दी थीं। पीठ ने कहा कि एजीआर की बकाया राशि का 20 साल में भुगतान के लिये केन्द्र का प्रस्ताव अनुचित है और दूरसंचार कंपनियों को शीर्ष अदालत के फैसले के अनुरूप बकाये की सारी राशि का भुगतान करना होगा।
पीठ ने कहा कि दूरसंचार कंपनियों द्वारा किये गये स्व-मूल्यांकन को अनुमति देने का मतलब न्यायालय का इस छल में पक्षकार बनना है। शीर्ष अदालत ने कहा कि एजीआर बकाया राशि के मामले में हमारा फैसला अंतिम है और इसका पूरी तरह पालन करना होगा।
(भाषा इनपुट के साथ)

