Supreme Court on Lower Court Judges: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल कथित रूप से गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश पारित करने के आधार पर जिला न्यायपालिका के किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द करते हुए हाईकोर्ट को इस तरह की यांत्रिक कार्रवाई से सावधान रहने को कहा है।
पीठ ने निर्भय सिंह सुलिया की अपील स्वीकार कर ली। सुलिया को 2014 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र जज के पद पर रहते हुए सेवा से हटा दिया गया था। उन पर आबकारी अधिनियम के तहत जमानत याचिकाओं के निपटारे में दोहरा मापदंड अपनाने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए। यह कार्रवाई हाईकोर्ट द्वारा कराई गई विभागीय जांच के बाद की गई।
आरोप है कि मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के अंतर्गत दर्ज मामलों में जहां 50 बल्क लीटर से अधिक शराब की जब्ती हुई, कुछ मामलों में जमानत दी गई जबकि अन्य समान मामलों में यह कहते हुए जमानत खारिज कर दी गई कि इतनी मात्रा में शराब जब्त होने पर जमानत नहीं दी जा सकती।
अनुशासनात्मक कार्रवाई में सावधानी आवश्यक
मुख्य निर्णय लिखते हुए न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने कहा कि हाईकोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। केवल इसलिए कि कोई आदेश गलत है या निर्णय में त्रुटि है बिना किसी अतिरिक्त ठोस सामग्री के, किसी न्यायिक अधिकारी को विभागीय कार्यवाही की पीड़ा से नहीं गुजरना चाहिए।
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न्यायमूर्ति पारदीवाला ने अपने सहमतिपूर्ण निर्णय में कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई के भय के कारण कई बार निचली अदालत के जज योग्य मामलों में भी जमानत देने से बचते हैं, जिससे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिकाओं की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है।
शिकायत के खिलाफ अवमानना तक की हो कार्रवाई
पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शिकायतें करता पाया जाए तो उसके खिलाफ अवमानना सहित उपयुक्त कार्यवाही की जानी चाहिए।
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यदि शिकायतकर्ता बार का सदस्य हो तो बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संदर्भ भेजा जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कदाचार के आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाएं, वहां त्वरित और कठोर कार्रवाई आवश्यक है और ऐसे मामलों में कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।
किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं
न्यायिक स्वतंत्रता और ईमानदारी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका के किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार असहनीय है लेकिन केवल गलत आदेश या विवेकाधिकार के कथित गलत प्रयोग के आधार पर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती।
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अदालत ने पूर्व के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि किसी अधिकारी की ईमानदारी पर संदेह केवल आशंका या अनुमान के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए ठोस और संभावनाओं पर आधारित सामग्री होना आवश्यक है।
झूठी शिकायतों पर सख्ती के निर्देश
पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर भी कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शिकायतें करता पाया जाए तो उसके खिलाफ अवमानना सहित उपयुक्त कार्यवाही की जानी चाहिए। यदि शिकायतकर्ता बार का सदस्य हो तो बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संदर्भ भेजा जाना चाहिए।
न्यायिक स्वतंत्रता और ईमानदारी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका के किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार असहनीय है लेकिन केवल गलत आदेश या विवेकाधिकार के कथित गलत प्रयोग के आधार पर विभागीय कार्रवाई उचित नहीं ठहराई जा सकती। अदालत कहा कि किसी अधिकारी की ईमानदारी पर संदेह केवल आशंका या अनुमान के आधार पर नहीं किया जा सकता।
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