इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अधिवक्ताओं को सलाह दी है। कोर्ट ने कहा कि वे वकील ऐसी याचिकाओं को दायर करने या अपने मुवक्किल से ऐसे केस लेने से बचें, जिनका कोई मतलब नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी याचिकाओं से कोर्ट का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है। जिसका उपयोग अन्य मामलों के निपटारे के लिए किया जा सकता है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का मुखपत्र नहीं होता, क्योंकि वह न्यायालय के समक्ष मुवक्किल का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील को योग्यताहीन याचिका दायर करने के लिए फटकार लगाई और उसे मेरिट पर ही खारिज कर दिया।

अधिवक्ताओं को सलाह देते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि कोई मुवक्किल किसी तुच्छ याचिका को दाखिल करने या कोई निराधार दलील पेश करने पर जोर देता है, तो अधिवक्ता को उसे ऐसा न करने की सलाह देनी चाहिए और ऐसी तुच्छ दलीलों को स्वीकार करने से बचना चाहिए।

अदालत ने कहा कि अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि होने के अलावा एक वकील अदालत का एक जिम्मेदार अधिकारी होता है और उसे प्रासंगिक कानूनों, जिनमें क़ानून, नियम और न्यायिक मिसालें शामिल हैं, उसकी सहायता से जहां तक ​​संभव हो अपने सटीक और संक्षिप्त तर्कों के साथ अदालत की सहायता करनी चाहिए।

पीठ ने आगे कहा कि कहा जाता है कि बार और पीठ एक ही रथ के पहिए हैं। रथ के तेज और सुचारू रूप से चलने के लिए यह आवश्यक है कि सभी पहिए एक ही गति से आगे बढ़ें और पहियों का एक समूह रथ के पहियों के दूसरे समूह पर ब्रेक लगाने की कोशिश न करे।

क्या था मामला?

अदालत लखनऊ के ऋण वसूली न्यायाधिकरण के रजिस्ट्रार द्वारा जारी 11 नवंबर, 2025 की एक नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी ।

याचिकाकर्ता ने डीआरटी (ऋण वसूली न्यायाधिकरण) के समक्ष एक प्रतिभूतिकरण आवेदन (एसए) दायर किया था। याचिकाकर्ता ने निवेदन किया कि रजिस्ट्रार के पास विपक्षी पक्षों को यह बताने के लिए अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश देने का अधिकार नहीं है कि एसए को क्यों स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

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अदालत ने कहा कि याचिका 18 दिसंबर को रजिस्ट्रार के सामने पेश की गई थी। उस समय यह मामला पहले ही डीआरटी (ऋण वसूली न्यायाधिकरण) के पीठासीन अधिकारी के सामने सूचीबद्ध किया जा चुका था। याचिकाकर्ता की यह शिकायत कि मामला रजिस्ट्रार के बजाय पीठासीन अधिकारी के सामने होना चाहिए था, उसे 1 दिसंबर को ही दूर कर दिया गया था।

ऋण वसूली न्यायाधिकरण (प्रक्रिया) नियम, 1993 का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत रजिस्ट्रार को प्रतिवादी को नोटिस जारी करने का अधिकार दिया गया है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि रजिस्ट्रार के पास कारण बताओ नोटिस जारी करने की शक्ति नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रार प्रतिवादी को यह चेतावनी देने का भी अधिकार रखता है कि यदि वह जवाब दाखिल नहीं करता, तो मामले (एसए) की सुनवाई और फैसला एकतरफा किया जा सकता है।

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