Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) में नाम होना अपने-आप में नौकरी पाने का अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने नीतीश मौर्य और चार अन्य लोगों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि वेटिंग लिस्ट का मतलब सिर्फ यह होता है कि अगर चयनित उम्मीदवारों में से कोई शामिल न हो पाए, तभी वेटिंग लिस्ट वाले पर विचार किया जा सकता है।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने अपने आदेश में कहा कि वेटिंग लिस्ट हमेशा के लिए नहीं चल सकती और न ही किसी भर्ती प्रक्रिया को अनिश्चित समय तक लटकाया जा सकता है।अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वेटिंग लिस्ट में होना नौकरी की गारंटी नहीं है। भर्ती प्रक्रिया की एक समय सीमा होती है और तय समय के बाद वेटिंग लिस्ट का कोई अधिकार नहीं रह जाता।
याचिकाकर्ताओं ने प्रयागराज स्थित उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड की ओर से निकाले गए विज्ञापन के तहत सहायक शिक्षक (एलटी ग्रेड) के पदों के लिए आवेदन किया था। ये पद निजी तौर पर संचालित, मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त इंटर कॉलेजों में थे। शुरुआत में याचिकाकर्ताओं का नाम न तो चयन सूची (मेरिट लिस्ट) में आया और न ही प्रतीक्षा सूची में। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की।
हाई कोर्ट ने बोर्ड को निर्देश दिया कि वह अदालत द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार राज्य में मौजूद सभी खाली पदों को भरे। इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने विशेष अपील दायर की।
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सिंगल जज के आदेश में कहा गया था कि जो चयनित उम्मीदवार कहीं भी कार्यभार ग्रहण नहीं कर पाए हैं, उनके जरिए सभी खाली पद भरे जाएं और साथ ही प्रतीक्षा सूची में शामिल उम्मीदवारों को भी कॉलेज चुनने का विकल्प दिया जाए। इसके लिए उम्मीदवारों की एक नई सूची (नया पैनल) तैयार किया जाना था।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड, प्रयागराज के सचिव ने प्रतीक्षा सूची के तहत खाली पदों पर परामर्श (काउंसलिंग) को लेकर शिक्षा निदेशक (माध्यमिक) को एक पत्र भेजा। इसके बाद चयनित उम्मीदवारों की काउंसलिंग सहित पूरी प्रक्रिया पूरी कर ली गई। बाद में एक आदेश जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि पहले से बनी प्रतीक्षा सूची में किसी तरह का बदलाव करने की जरूरत नहीं है। इस आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
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