पोल वॉल्ट में भारत के नेशनल रिकॉर्ड होल्डर देव कुमार मीणा और उनके कोच घनश्याम को पनवेल रेलवे स्टेशन पर शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा। उन्हें अपना खेल उपकरण ले जाने की इजाजत नहीं मिली और ट्रेन से उतार दिया गया। ट्रैवलिंग टिकट एग्जामिनर (TTE) ने उन्हें अपने उपकरण के बगैर यात्रा करने को कहा। फिर काफी मिन्नतें करने और जुर्माना भरने के बाद ही जाने दिया गया।

20 साल के देव कुमार मीणा ने जुलाई 2025 में जर्मनी में वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स में 5.40 मीटर की छलांग लगाकर तीसरी बार अपना नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा था। वह मीट रिकॉर्ड बानने वाले कुलदीप और अन्य साथी एथलीटों के साथ मंगलुरु में ऑल इंडिया इंटर-यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप से लौट रहे थे।

कोच घनश्याम ने क्या कहा?

कोच घनश्याम ने मंगलवार को पीटीआई को बताया, ‘हम मंगलुरु से लौट रहे थे और हमें पनवेल से भोपाल के लिए ट्रेन लेनी थी। मैं कुछ खाने के लिए बाहर गया था, जबकि कुछ खिलाड़ी स्टेशन के बाहर खंभों के पास बैठे थे, तभी टिकट कलेक्टर ने उनसे सामान हटाने को कहा।मैं गया और समझाया कि ये पोल वॉल्ट पोल्स हैं, उसे हमारे पार्टिसिपेशन के सबूत और मेडल दिखाए, लेकिन उसने कहा कि इक्विपमेंट लगेज कम्पार्टमेंट में भेजे जाने चाहिए थे।’

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सेंट्रल रेलवे ने क्या कहा

इस बीच, सेंट्रल रेलवे के सीपीआरओ ने कहा है कि किसी भी रेलवे कर्मचारी का किसी भी खिलाड़ी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा कभी नहीं रहा है। अधिकारी ने कहा, ‘हम खिलाड़ियों की इज्जत करते हैं। हमने उनसे पनवेल से सामान वाले सेक्शन में पोल ​​बुक करने का अनुरोध किया था क्योंकि उसका साइज तय लिमिट से ज्यादा था।सोशल मीडिया पोस्ट में लगाए गए आरोपों के उलट, सच यह है कि ट्रेन को देरी से चलने के कारण री-शेड्यूल किया गया था। किसी भी रेलवे कर्मचारी का किसी भी खिलाड़ी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था।’

लगेज वैन में पोल क्यों नहीं ले जा सकते

घनश्याम ने कहा कि पोल वॉल्ट के पोल लगभग पांच मीटर लंबे होते हैं और उन्हें बगैर नुकसान के लगेज वैन में फिट नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, ‘ये पोल फाइबरग्लास के बने हैं और बहुत महंगे हैं। एक पोल की कीमत करीब 2 लाख रुपये है। जिस तरह से सामान हैंडल किया जाता है, उनके टूटने का असली खतरा रहता है। हमारे पास छह या सात पोल थे।’

कैसे पोल ले जाते हैं एथलीट

कोच ने बताया कि एथलीट आमतौर पर थर्ड एसी में सफर करते हैं और पोल्स को स्लीपर या जनरल डिब्बों में पंखों के ऊपर सावधानी से रखते हैं ताकि यात्रियों को कोई परेशानी न हो। घनश्याम कहा, ‘चोरी का भी खतरा है, इसलिए हमें उन पर नजर रखनी पड़ती है। हमने टिकट कलेक्टर को यह भी दिखाया कि खंभों से किसी को कोई परेशानी नहीं हो रही है, लेकिन वह इस बात पर अड़ा रहा कि या तो हम 8,000 रुपये दें या खंभों को स्टेशन पर ही छोड़ दें। मैंने उससे मिन्नतें कीं, कहा कि मैं 8,000 रुपये कहां से दूंगा और अगर हम पैसे दे भी दें तो खंभों को कैसे ले जाया जाएगा?’

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मध्य प्रदेश सरकार के पत्र को भी नजरअंदाज किया गया

इस समस्या को हल करने की कोशिश में घनश्याम ने मुंबई में रेलवे स्पोर्ट्स ऑफिसर ओलंपियन रंजीत माहेश्वरी और उनकी पत्नी वी.एस. सुरेखा से संपर्क किया, जो खुद एक पूर्व पोल वॉल्टर हैं। घनश्याम ने बताया, ‘उन दोनों ने टिकट कलेक्टर से कहा कि एथलीटों को परेशान न करें, क्योंकि अगर यह मामला सोशल मीडिया पर आया तो बहुत शर्मिंदगी होगी। हमने मध्य प्रदेश सरकार के खेल विभाग का एक पत्र भी दिखाया जिसमें लिखा था कि यह खेल का सामान है और इसे ले जाने की इजाजत दी जानी चाहिए, लेकिन उसे नजरअंदाज कर दिया गया।’

ट्रेन छूटी और 1,875 रुपये जुर्माने दिया

इस परेशानी की वजह से एथलीटों की ट्रेन छूट गई और करीब चार से पांच घंटे तक बार-बार अपील करने के बाद उन्हें आखिरकार 80 किलो सामान ले जाने के लिए जुर्माने के तौर पर 1,875 रुपये देने के बाद यात्रा करने की इजाजत मिली। यह जुर्माना उन्होंने अपनी जेब से दिए। घनश्याम ने इंटरनेशनल लेवल-1 कोचिंग कोर्स पूरा किया है और फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने इस घटना को बहुत निराशाजनक बताया। एशियन अंडर-20 ब्रॉन्ज मेडलिस्ट देव ने भी अपने कोच की चिंताओं से सहमति जताई और एक स्थायी समाधान की मांग की।

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जूनियर एथलीट किस दौर से गुजरते होंगे?

देव कुमार मीणा ने कहा, ‘मैं एक इंटरनेशनल एथलीट हूं और अगर भारत में मेरे साथ ऐसा हो रहा है तो कोई सोच सकता है कि जूनियर एथलीट किस दौर से गुजरते होंगे। यह कोई नई बात नहीं है। पोल और भाले जैसे एथलेटिक इक्विपमेंट को ट्रांसपोर्ट करने के लिए साफ गाइडलाइंस और एक सही सिस्टम होना चाहिए, जैसे एथलीटों के ट्रैवल के लिए इंतजाम होते हैं। हम किसी के खिलाफ शिकायत नहीं कर रहे हैं। हमारी बस यही गुजारिश है कि एक एथलीट का इक्विपमेंट कॉम्पिटिशन तक सुरक्षित पहुंचे। एथलीट और कोच कई चुनौतियों का सामना करते हैं और ऐसी घटनाए सिर्फ फोकस और तैयारी में रुकावट डालती हैं।’

पीटीआई इनपुट से खबर