पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। देश की आजादी के बाद पश्चिम बंगाल पहला ऐसा राज्य रहा है, जहां लंबे समय तक वामपंथ की सत्ता रही है। सन 1977 से 2011 तक वहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सरकार रही। यानी पूरे 34 साल तक वामपंथ का जनता ने समर्थन किया। इसके बाद जनता ने बदलाव किया और नए राजनीतिक दल तृणमूल कांग्रेस को ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता पर बिठाया। देश के किसी अन्य राज्य में इतने लंबे समय तक वामपंथ को न तो जनता का समर्थन मिला और न ही वह स्थायी रूप से सत्ता में रह सका।
आखिर बंगाल में ऐसा क्या था, जिसकी वजह से कम्युनिस्ट इतने लंबे समय तक टिके रहे
भारतीय राजनीति का यह एक अलग और अनोखा उदाहरण रहा है। यह कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं थी। इसलिए यह सवाल बार-बार उठता है कि आखिर बंगाल में ऐसा क्या था, जिसकी वजह से कम्युनिस्ट इतने लंबे समय तक टिके रहे। क्या इसका कारण बंगाली समाज की कोई विशेष साम्यवादी मानसिकता थी, या फिर इसके पीछे ऐतिहासिक और सामाजिक वजहें थीं?
बंगाल को समझने के लिए सबसे पहले उसके बौद्धिक और ऐतिहासिक माहौल को भी समझना जरूरी है। दरअसल उन्नीसवीं सदी में जिस दौर को बंगाल पुनर्जागरण कहा जाता है, उसी समय यहां समाज और सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा बहुत तेजी से मजबूत हुई। राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने धर्म, जाति, महिलाओं की स्थिति और सामाजिक अन्याय पर खुलकर बहस की। इतिहासकार सुमित सरकार के मुताबिक बंगाल में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ राजनीतिक चेतना बहुत पहले पैदा हो चुकी थी।
पश्चिम बंगाल चुनाव में हाथ मिलाने को लेकर असमंजस में क्यों हैं कांग्रेस और लेफ्ट?
बंगाल में अखबार, किताबें, कविता और नाटक केवल मनोरंजन के साधन नहीं थे, बल्कि समाज और सत्ता की आलोचना के मंच थे। मशहूर लेखक और विचारक रामचंद्र गुहा का मानना है कि बंगाली समाज में चाय की दुकानों से लेकर साहित्यिक सभाओं तक हर जगह राजनीति पर बहस हमेशा से होती रही है। इसी माहौल में जब बीसवीं सदी में मार्क्सवाद जैसे विचार आए तो वे बंगाल के लोगों को पूरी तरह बाहरी या अजनबी नहीं लगे। बराबरी, न्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष की भाषा पहले से ही लोगों को समझ में आती थी।
वामपंथी राजनीति की असली ताकत बंगाल के गांवों में थी। आजादी से पहले और उसके बाद लंबे समय तक बंगाल का किसान जमींदारी शोषण से परेशान रहा। बटाईदार किसानों के पास जमीन तो थी लेकिन कानूनी सुरक्षा नहीं थी। इसके चलते वे इस डर में जीते थे कि किसी भी समय उन्हें जमीन से हटाया जा सकता है। इसी को राजनीतिक विचारक अतुल कोहली कहते हैं कि किसान असुरक्षा वामपंथ के लिए सबसे मजबूत आधार बनी।
1977 में सत्ता में आने के बाद वाम मोर्चा सरकार ने ‘ऑपरेशन बर्गा’ शुरू किया। इसके तहत बटाईदार किसानों का पंजीकरण किया गया और उन्हें कानूनी अधिकार दिए गए। कुछ ही वर्षों में 12 से 15 लाख बटाईदार किसानों को यह सुरक्षा मिली। उन्हें भरोसा हुआ कि अब उनकी जमीन उनसे छीनी नहीं जाएगी और फसल में उनका हिस्सा सुरक्षित रहेगा।
इसके साथ-साथ सरकार ने अतिरिक्त कृषि भूमि को गरीब किसानों में बांटा। पूरे देश में जितनी अतिरिक्त जमीन वितरित हुई, उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल में ही हुआ। इससे लाखों दलित, आदिवासी और गरीब परिवार पहली बार जमीन के मालिक बने। गांव-गांव में यह भावना बनी कि सरकार पहली बार सचमुच गरीबों के साथ खड़ी है। यही कारण था कि ग्रामीण बंगाल में कम्युनिस्टों को लगातार समर्थन मिलता रहा।
इस दौर में कांग्रेस पार्टी बंगाल में कमजोर होती चली गई। सत्तर के दशक में कांग्रेस गुटबाजी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अस्थिरता से जूझ रही थी। आपातकाल की यादें भी लोगों के मन में ताजा थीं। ऐसे समय में कम्युनिस्ट पार्टी ने खुद को एक अनुशासित, सादा और वैचारिक रूप से साफ विकल्प के रूप में पेश किया। लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे ज्योति बसु ने अपने भाषणों में कई बार यह साफ तौर पर कहा है कि उनकी पार्टी लोकतंत्र और संविधान के भीतर रहकर बदलाव की बात करती है। इससे बंगाल के मध्यम वर्ग का डर भी काफी हद तक कम हुआ।
सत्ता हासिल करने के लिए मजबूत संगठन राजनीतिक दलों की बुनियादी जरूरत होता है। कम्युनिस्ट पार्टी सिर्फ चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं थी। सीपीआई(एम) गांव-गांव तक फैला हुआ संगठन था। शिक्षक संगठन, ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन और स्थानीय कमेटियां पार्टी से जुड़ी हुई थीं। कई बार लोग अपने छोटे-मोटे विवाद या सरकारी काम के लिए सीधे पार्टी के पास जाते थे। इस तरह पार्टी ने धीरे-धीरे राज्य के समानांतर एक सामाजिक ढांचा खड़ा कर लिया।
बंगाल में संस्कृति और राजनीति का रिश्ता भी बहुत गहरा रहा है। कविता, नाटक, सिनेमा और गीतों में वाम विचारधारा की झलक साफ दिखाई देती थी। मृणाल सेन और ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकारों से लेकर नाटककारों और कवियों तक कई रचनाकारों ने सामाजिक अन्याय और वर्ग संघर्ष को अपनी कला का विषय बनाया। इससे वामपंथ को एक तरह की नैतिक और सांस्कृतिक पहचान मिलती चली गई।
अब सवाल आता है कि क्या बंगाली समाज मूल रूप से साम्यवादी है। अधिकतर इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक इससे इनकार करते हैं। रामचंद्र गुहा का विचार है कि बंगाली समाज किसी एक विचारधारा से स्थायी रूप से नहीं जुड़ा रहा है। वह बहस करना पसंद करता है, सत्ता से सवाल करता है और नए तरह के प्रयोग करने से नहीं डरता है।
जब लोगों को लगने लगा कि उद्योग नहीं आ रहे हैं, नौकरियां घट रही हैं, युवा बाहर जा रहे हैं और पार्टी कैडर सत्ता के प्रतीक बनते जा रहे हैं, तब वही समाज वाम शासन से दूर होने लगा। 2011 में जब वाम मोर्चा सत्ता से बाहर हुआ तो यह साफ हो गया कि बंगाल की राजनीति आस्था पर नहीं बल्कि मूल्यांकन पर चलती है।
इसकी तुलना अगर दूसरे राज्यों से की जाए तो पता चलता है कि केरल में वामपंथ शिक्षा और स्वास्थ्य सुधारों के जरिये समाज का हिस्सा बना, जबकि बंगाल में वह लंबे समय तक सत्ता और संगठन के रूप में हावी रहा। त्रिपुरा में वामपंथ आदिवासी पहचान और सुरक्षा का माध्यम बना। वहीं उत्तर भारत खासकर यूपी और बिहार में राजनीति जाति और पहचान के ही इधर-उधर घूमती रही, जिससे वर्ग आधारित वाम राजनीति वहां मजबूत नहीं हो सकी।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक कम्युनिस्ट शासन किसी जन्मजात साम्यवादी मानसिकता का परिणाम नहीं था। यह इतिहास, भूमि सुधार, संगठन की ताकत और बौद्धिक परंपरा का संयुक्त नतीजा था। और जब यही मॉडल जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा तो उसी समाज ने उसे बदलने में भी देर नहीं की।
आज का बंगाल उस दौर से काफी आगे निकल चुका है जब वामपंथ ही उसकी पहचान माना जाता था। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वाम शासन की जगह ली, लेकिन राजनीति की मूल प्रकृति नहीं बदली। आज भी बंगाल का समाज सत्ता से सवाल करता है, नीतियों का मूल्यांकन करता है और विकल्पों को आज़माने से नहीं हिचकता। फर्क बस इतना है कि अब वर्ग संघर्ष की जगह पहचान, कल्याण योजनाएं और क्षेत्रीय अस्मिता केंद्र में हैं। उद्योग, निवेश और रोजगार को लेकर जो बहसें आज हो रही हैं, वे उसी आलोचनात्मक परंपरा का हिस्सा हैं, जिसने कभी वामपंथ को जन्म दिया था और फिर समय आने पर उसे सत्ता से बाहर भी किया। इसलिए आज के बंगाल को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यहां कोई विचारधारा स्थायी नहीं होती – यहां स्थायी होती है केवल सवाल करने की आदत।
