मध्य प्रदेश के धार जिले में शुक्रवार को बसंत पंचमी के अवसर पर विवादित परिसर में ‘अखंड पूजा’ हुई और दूसरी ओर मुस्लिमों ने नमाज भी अदा की। बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक ही दिन पड़ने के मद्देनजर यहां किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए करीब 8,000 की तादाद में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी।
जानकारी के मुताबिक, धार के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर में हिंदू समुदाय के हजारों लोगों ने वाग्देवी (देवी सरस्वती) की पूजा-अर्चना की और विवादित परिसर के एक अन्य स्थान पर मुस्लिम समाज के लोगों ने नमाज भी अदा की। ऐसे में यह विवादित परिसर तेजी से सुर्खियां बटोर रहा है कि आखिर क्या है यह भोजशाला विवाद…
भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से आरंभ होता है, कहा जाता है कि यहां देवी सरस्वती का मंदिर था। 12वीं और 13वीं सदी में इस मंदिर में तोड़फोड़ किया गया और इसी जगह पर एक मकबरा बनाया गया और पास में ही एक मस्जिद का निर्माण हुआ।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1034वीं में परमार वंश के राजा भोज ने भोजशाला की स्थापना की, जिन्हें 72 कलाओं का ज्ञाता माना जाता था। कहा जाता है कि यह एक भव्य आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था, जिसकी तुलना नालंदा तक्षशिला से होती थी। यहां कालिदास, भवभूति, भास्कर भट्ट, धनपाल, मानतुगाचार्य और बाणभट्ट जैसे महान विद्वानों ने पढ़ा और पढ़ाया है।
धार में कब आया इस्लामी शासन?
इस्लामी शासन के दौरान 1269 में अरब मूल के कमाल मौलाना धार में आकर बसे। 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने इस क्षेत्र पर आक्रामण किया और कब्जा कर लिया। इसी दौरान भोजशाला समते कई मंदिरों को तोड़ा। 1569 में महमूद खिलजी द्वितीय ने परिसर के पास चिश्ती संत कमाल मौलाना का मकबरा बनवाया। इसी वजह से मुस्लिम समाज इसे कमाल मस्जिद कहते हैं।
इसके बाद ब्रिटिश काल के दौरान 1857 में यहां खुदाई के दौरान देवी वाग्देवी की प्रतिमा निकली, जिसे ब्रिटिश अधिकारी विलियम किनकेड अपने साथ लंदन लेकर चले गए, जहां यह मूर्ति आज भी लंदन के म्यूजियम में है। ये तो हुई आजादी के पहले की बात अब आइए जानते हैं आजादी से आज तक का इतिहास
आजादी के बाद का इतिहास
आजादी मिलने के बाद साल 1951 में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया, 1952 में हिंदुओं ने मंदिर परिसर के पास भोज दिवस मानने का फैसला लिया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ा। फिर साल 1953 में मुस्लिम पक्ष ने भी जवाब देते हुए उर्स मनाना शुरू किया। अगले कुछ सालों तक यह व्यवस्था बना रही, इसमें मुस्लिम समुदाय शुक्रवार को नमाज अदा करता और हिंदू समुदाय बसंत पंचमी पर पूजा करता।
1961 में इतिहासकार डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन गए और वाग्देवी की प्रतिमा के भारतीय मूल के होने का सबूत पेश किया। हालांकि अभी तक तनाव नहीं बढ़ा सब शांति से होता रहा।
1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस होने के बाद मध्य प्रदेश में कुछ हिंदू संगठनों ने भोजशाला को पूरी तरह हिंदुओं के लिए खोलने और शुक्रवार की नमाज पर बैन लगाने और मूर्ति वापल लाने की मांग की। दो साल बाद यानी 1994 में विश्व हिंदू परिषद ने स्मारक पर झंडा फहराने की धमकी दी जिसके बाद धार जिले में कर्फ्यू लग गए और फिर दोनों पक्षों के बीच मंगलवार-शुक्रवार को प्रार्थना का सिलसिला चला।
विवाद ने गिरा दी कांग्रेस की राज्य सरकार
1997 में एक बार फिर विश्व हिंदू परिषद ने स्मारक पर झंडा फहराने का ऐलान किया और फिर प्रशासन ने यहां लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी। फिर साल 2003 जनवरी में भोजशाला को लेकर तनाव उग्र हो गया। इसी साल प्रदेश में चुनाव था। बसंत पंचमी पर हिंदू जागरण मंच ने विवादित स्थल पर जाने की घोषणा की। इस दौरान जब पुलिस ने उन्हें रोका और लाठीचार्ज किया तो प्रदर्शन उग्र हो गया। इस दौरान कई पुलिसकर्मी घायल हो गए और कुछ जगहों पर आगजनी भी हुई।
इसके बाद यह मामला फरवरी में लोकसभा में भी उठा, तत्कालीन विदिशा सांसद शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि भोजशाला में हिंदुओं की एंट्री पर बैन कर हिंदुओं को दबाने की कोशिश की है। मार्च में अटल बिहारी सरकार के केंद्रीय मंत्री जगमोहन ने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की राज्य सरकार को सलाह दी की हिंदुओं को सूर्योदय से सूर्योस्त तक पूजा करने की इजाजत दें और मुस्लिमों को शुक्रवार को 1 बजे से 3 बजे तक नमाज पढ़ने की इजाजत दें। हालांकि यह कांग्रेस के फॉर्मूले से अलग था। कांग्रेस ने हिंदुओं को महज मंगलवार को भोजशाला परिसर में दो घंटे के लिए पूजा की अनुमति दी थी।
इसके बाद भाजपा ने इस मुद्दे को चुनाव में खूब भुनाया और दिग्विजय सिंह पर उमा भारती ने जमकर हमला बोला। इस प्रचार का जनता पर असर हुआ और कांग्रेस विधानसभा चुनाव हार गई। इसी तरह दिसंबर 2003 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाया गया।
मध्य प्रदेश राजनीति का है प्रमुख मुद्दा
प्रदेश में यह मुद्दा इतना अहम है कि 2022 में शिवराज चौहान ने ब्रिटिश म्यूजियम से देवी सरस्वती की मूर्ति वापस लाने का वादा किया और यही मुद्दा 2024 के लोकसभा चुनावों में उठाया गया।
इधर साल 2024 में ही हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 11 मार्च 2024 को इंदौर खंडपीठ ने एएसआई को पूरे परिसर का सर्वे करने का निर्देश दिया। इस याचिका में एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी।
15 जुलाई 2024 को एएसआई ने अपनी दो हजार पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखी जिसमें पाया गया कि मौजूदा ढांचा पहले से मौजूद मंदिरों के हिस्सों पर बनाया गया। एएसआई को यहां लाल पत्थर के नक्काशीदार खंभों वाला एक बड़ा सभा कक्ष और बीच में एक यज्ञ कुंड मिला। साथ ही यहां मिले शिलालेखों में संस्कृत वर्णमाला, व्याकरण के नियम और कर्पूरमंजरी नामक नाटक के अंश मिले हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि जांच के दौरान खुदाई में मिले अवशेष परमार काल के हैं। साथ ही एएसआई ने बताया कि खंभों और दीवारों पर मौजूद मानवीय और पशु आकृतियों को जानबूझकर मिटाया या खराब किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती
एएसआई के सर्वे के आदेश के खिलाफ मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां कोर्ट ने 1 अप्रैल 2024 को निर्देश दिया कि सर्वे के नतीजों पर कोई कार्रवाई न की जाए और न ही कोई खुदाई की जाए, जिससे जगह का स्वरूप बदल जाए। हालांकि इस रिपोर्ट के आधार पर मस्जिद को बंद करने और यहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित करने की मांग तेज हो गई।
क्या है अब का आदेश?
सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में विवादित भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को पूजा करने की अनुमति दी है और मुस्लिम पक्ष को भी शुक्रवार के दिन दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज पढ़ने की इजाजत दी है। कोर्ट ने दोनों पक्षों से आपसी सम्मान और सहयोग बनाए रखने की अपील भी की थी। आगे पढ़िए घरों में तोड़फोड़, बस-दुकानें जलाईं और मंदिर पर पथराव…, उज्जैन में सामुदायिक टकराव के बाद 15 गिरफ्तार
