लोकप्रिय गायिका जसपिंदर नरूला का कहना है कि बदले समय का असर संगीत पर भी दिख रहा है। आज की युवा पीढ़ी की पसंद क्षणिक होती है। आज जो गाना धूम मचा रहा होता है, एक हफ्ते बाद कोई उसे गुनगुनाता भी नहीं। इसलिए अब कालजयी गीतों का समय लौटने की उम्मीद नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि पंजाब ने जो आतंकवाद का लंबा दौर देखा, उसमें वहां की सांस्कृतिक विधाओं को भी गहरा नुकसान पहुंचा। कला को सरहदों में बांधने की कोशिशों पर उन्होंने कहा कि जिन पाकिस्तानी कलाकारों को हिंदुस्तान से रोजी-रोटी और बेशुमार प्यार मिलता है, वे कभी भी हमारे पक्ष में खड़े नहीं होते हैं। जसपिंदर नरूला के साथ चंडीगढ़ में कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की विस्तृत बातचीत के चुनिंदा अंश
’सप्त सिंधु सिने अवार्ड्स के लिए आप चंडीगढ़ आईं। पंजाबी संगीत और सिनेमा में आपकी पहचान का सम्मान शुरू से रहा है। फिल्म फेयर पुरस्कार से लेकर पद्मश्री पुरस्कार तक से आप नवाजी जा चुकी हैं। पंजाब में कलाकारों के सम्मान के लिए जो यह पुरस्कार समारोह शुरू किया गया है, उसे आप कैसे देखती हैं?
जसपिंदर नरूला: ये तो एक बहुत अच्छी शुरुआत है। इस तरह के कार्यक्रम होने भी चाहिए। आज बहुत से अच्छे कलाकार आ रहे हैं। इस तरह के सम्मान समारोहों से कलाकार की पहचान को विस्तार मिलता है।
पंजाबी फिल्म उद्योग अभी तक मुकम्मल पहचान से क्या इसलिए भी पीछे रह गया, कि इसे अभी तक इस तरह की मान्यता देने की कोशिश नहीं की गई। साहित्य, सिनेमा से लेकर संगीत तक को अगर राज्य का सम्मान प्राप्त होता है तो वह बेहतर फलता-फूलता है।
जसपिंदर नरूला: बिल्कुल सही बात कह रहे हैं आप। पहले पंजाब की फिल्मों की पहचान होती थी, उन्हें कर-मुक्त किया जाता था। ‘नानक नाम जहाज’ फिल्म का ही उदाहरण लीजिए। ‘दुख भंजन तेरा नाम’, ‘चन्न परदेसी’ जैसी कितनी अच्छी फिल्में आई थीं। इसमें राज बब्बर साहब की अदाकारी यादगार है। उस वक्त फिल्मों में द्विअर्थी गीत और द्विअर्थी संवाद नहीं होते थे। फिल्में पारिवारिक मनोरंजन किया करती थीं। पहले धीरे-धीरे पंजाबी गाने खत्म हुए और फिर फिल्में खत्म हुर्इं। अब चुनिंदा लोग हैं, जो पंजाबी गानों की आत्मा को जिंदा रखकर खुद जिंदा रहने की कोशिश में हैं।
पंजाबी गानों को पुनर्जीवित करने में बहुत बड़ा श्रेय आपको भी जाता है। आपकी गाई ‘हीर’ लोगों की जुबां पर है। सवाल है कि हीर मिर्जा जैसे लोकगीत को बचाने की राह क्या हो?
जसपिंदर नरूला: आज भी कुछ लोग गा रहे हैं। मैं और जसबीर जैसे लोग इकट्ठे होते हैं तो, हम उन लोगों की बातें करते हैं जो अच्छी हीर गा रहे हैं। गाएं भी क्यों नहीं? यह तो हमारी सांस्कृतिक जड़ है। मेरी खुद की योजना है कि मैं इन लोकगीतों को रिकार्ड करूं। यह ठीक बात है कि हर इंसान हीर नहीं गा सकता। आसा सिंह मस्ताना बहुत अच्छी हीर गीत गाते थे। मेरे कालेज का शुरुआती समय था। आकाशवाणी दिल्ली में मेरे गाए हीर की रिकार्र्डिंग हो रही थी। आसा सिंह मस्ताना बाहर खड़े थे। मैं गाकर बाहर निकली तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उन्होंने कहा, पुत्तर मैं सोचता था, सिर्फ मैं ही हीर गा सकता हूं। तूने तो मुझे रूला दिया। ऐसा दुर्भाग्य कि रिकार्र्डिंग से लौटते वक्त मैं भीषण दुर्घटना की शिकार हो गई। मस्ताना जी जब मुझे देखने आए तो बोले, मेरी नजर लग गई इस बच्ची को, क्योंकि उस दिन इसने ऐसा गाया, जैसा कोई सोच भी नहीं सकता था। मैंने बचपन से पंजाबी संगीत के बहुत से अच्छे गायकों को देखा। आज राह दिखाने वाली बात पर तो सबसे पहली मुश्किल यह है कि हीर जैसे लोकगीत को गाने वाले के साथ सुनने वाले तो चाहिए, जिन्हें इस विधा के बोल और सादगी पसंद हो।
आसा सिंह मस्ताना, सुरिंदर कौर…कहां गए ये लोग?
जसपिंदर नरूला: मैं भाग्यशाली हूं कि इन लोगों के बीच पली-बढ़ी। मेरे पिताजी सरदार केसर सिंह नरूला जी और माता मोहिनी नरूला दोनों संगीत को समर्पित थे। पिताजी ने तो ऐसे बहुत से कलाकारों को पहली बार मंच प्रदान किया जो आगे चल कर बड़े नाम हुए। आसा सिंह मस्ताना, सुरिंदर कौर, नरिंदर, बीबा जी, यमला जट्ट। मोहम्मद सिद्दीक, रंजीत कौर, के दीप, जगमोहन, पम्मी पोली, कुलदीप मानक। ऐसे बहुत से कलाकार हैं, जिनका नाम अभी बात करते हुए जेहन में नहीं आ रहा है। वह कर्म प्रधान समय था, मैं भी कर्म प्रधान हूं। हम सबने जीवन में कर्म करके ही पाया है सब कुछ। समय बदल गया है तो अब लोग भी बदल गए हैं।
इस तरह के कलाकार अब क्यों नहीं आ रहे हैं? क्या कमी है? फिल्म उद्योग की तरफ से कमी है, सरकार की तरफ से कमी है?
जसपिंदर नरूला: आज के समय का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना हो गया है। अगर वैसा संगीत बन भी जाए तो उसे सुनने वाले कहां हैं? आज के समय में लोगों के दिल-दिमाग का स्वाद बहुत जल्दी बदल जाता है। कोई गाना एक हफ्ते धूम मचा देगा, और कुछ समय बाद कोई उसे गुनगुनाता हुआ भी नहीं मिलेगा। कोई एक कलाकार पूरे देश की धड़कन बन जाता है, और थोड़े दिनों बाद गुम हो जाता है। इसके पीछे बहुत सारी शक्तियां हैं। जहां तक मेरा निजी सवाल है तो मेरी ईश्वर पर अगाध श्रद्धा है। मैं तो इस समय को कलयुग की तरह देख रही हूं, जहां भीषण बदलाव हो रहे हैं। चीजें इतनी तेजी से बदल रही हैं कि उन्हें समझना, उनका विश्लेषण करना मुश्किल है। अगर आप मेरे भाव को समझ पाएंगे, तो यही कहना चाहूंगी कि इस कलयुग का जल्द ही अंत होने वाला है।
लोगों को वैसा संगीत मिलेगा कि नहीं?
जसपिंदर नरूला: मुझे तो नहीं लगता कि हमें अब कभी वो मिलेगा, जो अब इतिहास बन चुका है।
इस निराशा का कारण?
जसपिंदर नरूला: कारण वही जो दो बार बोल चुकी हूं। जब सुनने वाले ही नहीं हैं तो गाने वाले कहां से आएंगे?
लेकिन उन्हीं गानों का ‘रिमेक’ लोकप्रिय हो जाता है।
जसपिंदर नरूला: पुराने गानों को, पुराने तरीके से ही लाएंगे तो कितने लोग सुनेंगे? उस सादगी को कितने लोग पसंद करेंगे? वो सादगी अब खत्म हो गई है। लोगों को सिर्फ दिखावा चाहिए। जब मैं कार्यक्रमों में जाती हूं तो साथ वालों को देख कर हैरत होती है कि क्या गा रहे हैं, कैसे गा रहे हैं! और, वे जितने पैसों की मांग कर रहे हैं, उन्हें मिल भी रहे हैं। मैं किसी को बुरा नहीं कह रही हूं। लेकिन अच्छी चीजें खत्म होती जा रही हैं। आज तो शुद्ध देसी घी खाने में भी डर लगता है, पता नहीं कैसे बना हो। हमारे घरों में तो अब गाय नहीं है। जब दूध ही अच्छा नहीं आ रहा है, तो भला घी कैसे अच्छा बन सकता है?
आपने बहुत सारे लोगों के नाम लिए, पर एक नाम लेना शायद भूल गईं। वह नाम है अमर सिंह चमकीला का। उनकी जिंदगी पर बनी इम्तियाज अली की फिल्म बहस का विषय बनी। जसपिंदर नरूला वो नाम है, जिन्होंने फिल्म में चमकीला के महिमामंडन पर सवाल उठाए थे। हम आपसे इसके बारे में जानना चाहेंगे।
जसपिंदर नरूला: आपने फिर वही बात छेड़ दी, जिसके बारे में मेरा कहा पहले ही बहुत से लोगों को अच्छा नहीं लगा था। चमकीला एक कलाकार थे और उनको पहला मौका मेरे पिताजी ने ही दिया था। उस वक्त भी चमकीला ने जो गाने गाए थे, वह हमारे सुनने लायक नहीं थे। मेरे पिताजी ने मेरी माताजी को बोला था कि इसके गाने थोड़े द्विअर्थी हैं। जितना चलते-फिरते हमने उन्हें सुना वो बहुत ‘हिट’ हुआ। लेकिन उसके बाद जो हुआ, वह बहुत बुरा था। वह समय पंजाब के लिए, सबसे मुश्किल समय था। उन दिनों फिल्मी कलाकारों पर बहुत ज्यादा हमले हो रहे थे। उस वक्त हम भी पंजाब कम आते थे और उसका कारण यही था। लेकिन हमने जब भी पंजाब में गाया सूफी से लेकर वहां की मिट्टी से जुड़े संगीत को प्रधानता दी। लोग हमें सुनने आते थे। तब पंजाब में फिल्में तो होती नहीं थीं। बड़ा ही संतुलित कार्यक्रम होता था।
बात फिर चमकीला की। पंजाब में द्विअर्थी गीतों की वह धारा तो अभी भी बह रही है।
जसपिंदर नरूला: सरकार से लेकर नियामक संस्थाओं को इस पर ध्यान देना चाहिए। हमें आगे की पीढ़ी के बारे में सोचना चाहिए। कुछ चीजें पर्देदारी में रहती हैं, तभी अच्छा होता है। एक पर्दा रहना बहुत जरूरी है।
द्विअर्थी गानों के अलावा एक और धारा बह रही है, जो बड़े स्तर पर चिंता पैदा कर रही है। वह है हिंसा को महिमामंडित करने वाली धारा। इसके साथ ही जातीय अस्मिता को लेकर भी खूब गाने बन रहे हैं और हर तरफ सुने-सुनाए जा रहे हैं। ’’इन गानों को बनाने वाले भी हैं, गाने वाले भी हैं और सुनने वाले भी हैं। सवाल है कि हर कोई इन चीजों को कबूल क्यों कर रहा है? ये गाने बनाए इसलिए जा रहे हैं क्योंकि बिक रहे हैं।
बजरिए सिनेमा हिंसा समाज को आकर्षित करता रहा है। अब ये उग्र रूप में है। पर्दे पर की जिंदगी को असली जिंदगी में उतारा जा रहा है। चिंता इस उग्रता पर है।
जसपिंदर नरूला: बहुत सी चीजों का नियमन हो रहा है न! कानून बन रहे हैं न! फिर इन्हें नियंत्रित करने वाली एजंसियां अपना काम क्यों नहीं कर पा रही हैं? जब तक इस पर सरकार की तरफ से पाबंदी नहीं लगेगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता है। अभी का एक उदाहरण देखिए। कुत्तों के काटने की समस्या हुई तो मामला अदालत तक पहुंचा। दो वर्ग आमने-सामने थे। एक तरफ वे लोग, जिनके अपनों की कुत्ते के काटने से दर्दनाक मौत हुई। दूसरी तरफ वे लोग, जो कुत्तों से अथाह प्रेम करते हैं और उन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं चाहते। मुझे भी कुत्तों से प्रेम है। लेकिन इंसान की जान की कीमत तो होगी न। इस पर बहस चल रही है, लोग आमने-सामने हैं। कुछ रास्ता निकला है तो कुछ आगे निकलेगा। अगर हम बात ही नहीं शुरू करें, अपनी जिम्मेदारियां ही नहीं समझें तो फिर रास्ता कहां से निकलेगा? अगर आप इस तरह के मुद्दों पर बात करने की कोशिश करेंगे तो सोशल मीडिया पर आपकी ‘ट्रोलिंग’ शुरू हो जाएगी। आपको लेकर निर्णयात्मक छवि बना ली जाएगी। एक शेर है न, बदनाम हुए तो क्या, नाम तो होगा। सोशल मीडिया पर थोड़ी सी प्रसिद्धी की खातिर लोग बहुत कुछ कर गुजरने को तैयार होते हैं। जिन्हें सोशल मीडिया पर प्रसिद्धी नहीं मिलती, वे आप की गलतियां निकालने लगते हैं। सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर आप किसी भी मुद्दे को भटका सकते हैं। ये सारी बातें आपके संगीत वाले सवाल से ही जुड़ी हैं। आप मानें या न मानें, अगर गाने सुने नहीं जाएंगे तो बनेंगे भी नहीं। कितनी बार इस बहस में पड़ चुकी हूं कि ऐसे गानों को सुनिए ही मत। आम जनता उन्हें खारिज करे, उनसे परहेज करे, पर इन सबका नतीजा सिफर होता है। ऐसे माहौल में अच्छे गाने बनाने की कोशिश कौन करेगा?
फिर गायकों को भी ऐसे गाने से परहेज करना चाहिए? पिछले दिनों दिलजीत दोसांझ ने तर्क दिया कि सरकार को मेरे गाने में शराब के बोल से आपत्ति है। फिर सरकार शराब बेचना बंद क्यों नहीं कर देती है।
जसपिंदर नरूला: जी, मेरे कहने का मतलब यही है कि गायकों को निजी तौर पर पहल करने की जरूरत है। मैंने एक गाना गाया था, ‘ये जो हल्का हल्का सुरूर है, यह तेरी नजर का कसूर है के शराब पीना सीखा दिया’। अब किसी को ये तकलीफ हो गई कि इन्होंने शराब की बात कर दी। अब ये तो समझ का फेर है। यहां ईश्वर से बात करने के संदर्भ में शराब शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसमें ईश्वर के साथ खुमारी का सूफियाना भाव है। अब बेसमझ लोग एक पंक्ति को लेकर वरिष्ठ गायिका की बेइज्जती करने पर उतारू हो जाते हैं। हम तो गुरबानी में पढ़ते हैं कि ‘नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात’। अब वो खुमारी क्या शराब है? कुतर्क हर ओर है। क्या ही कर सकते हैं?
आपने हिंदी फिल्मों में भी नाम कमाया। फिर सूफी गीतों की ओर कैसे बढ़ीं?
जसपिंदर नरूला: मैंने बचपन से ही सूफी गीत गाए हैं। मेरा पहला गाना ही सूफी था। बुल्ले शाह से ही मेरी जिंदगी की शुरुआत हुई थी।
मलयाली, तेलुगु, मराठी सभी क्षेत्रों, भाषाओं की फिल्में विस्तार पा रही हैं। लेकिन पंजाबी फिल्में क्यों रुकी पड़ी हैं?
जसपिंदर नरूला: पंजाब के आतंकवाद ने जो बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया उसे कला क्षेत्र ने भी झेला था। जिस तरह की फिल्में बन रही थीं, जो आप अपने परिवार के साथ बैठ कर नहीं देख सकते, वे आगे बढ़ कर भी क्या करतीं?
पंजाब आतंकवाद के काल को पीछे छोड़ चुका है। जब सब चीजें आगे बढ़ चुकी हैं तो यहां पंजाबी फिल्म उद्योग जैसा कोई ढांचा क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है?
जसपिंदर नरूला: अब बड़े बजट की पंजाबी फिल्में आ रही हैं। नए लड़के-लड़कियां आ रहे हैं। मुंबई में भी पंजाबी फिल्में लगती हैं और मेरे बहुत से दोस्त देखने आते हैं। दिलजीत, एमी विर्क अपनी क्या खूब पहचान बना चुके हैं।देखते हैं, भविष्य किस ओर जाता है?
’भारत-पाक रिश्ते के द्वंद्व में संगीत को भी सरहदों में बांधने की कोशिश होती है। किसी तरह के तनाव के बाद दोनों देशों के कलाकारों पर भी पाबंदी लग जाती है। इसे किस तरह देखती हैं आप?
जसपिंदर नरूला: इस सवाल पर मैं थोड़ा स्पष्ट बोलूंगी। हम सरहद पार के कलाकारों को बेशुमार प्यार देते रहे हैं। उनकी आवाम में भी हमारे लिए बहुत प्यार है। अफसोस इस बात का है कि जब हिंदुस्तान पर किसी तरह का हमला होता है तो वहां से कोई कलाकार हमारी तरफदारी में नहीं बोलता है। हिंदुस्तान के पक्ष में कोई खड़ा नहीं होता है। वहां का कोई एक कलाकार नहीं कहता कि गलत हुआ है। गलत को गलत तो कहना होगा न! आपको यहां से रोजगार और प्यार मिलता है तो हिंदुस्तान के खिलाफ हुए काम पर बोलना चाहिए न!
