बिहार में आरसीपी सिंह की संभावित जद(यू) वापसी, हिमाचल में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान, मतदाता सूची पर विपक्ष का आक्रामक रुख, बंगाल की राजनीतिक बेचैनी और यूपी में प्रियंका गांधी की भूमिका – सभी संकेत दे रहे हैं कि सियासत निर्णायक मोड़ पर है।
सुबह का भूला
आरसीपी सिंह की जल्द ही जद (एकी) में वापसी हो सकती है। कभी नीतीश कुमार की आंखों का तारा माने जाने थे। लेकिन, 2022 में नीतीश उनसे चिढ़ गए तो उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी। बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में वे प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी में थे। पर अब किसी पार्टी में नहीं हैं। पटना के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पिछले हफ्ते उन्हें नीतीश के समीप देखा गया, तो पार्टी में वापसी की अटकलें तेज हुईं। अब जरा आरसीपी सिंह के बारे में जान लें। नीतीश के जिले नालंदा से नाता रखने वाले रामचंद्र प्रसाद सिंह उन्हीं की कुर्मी जाति के हैं। उत्तर प्रदेश कैडर के 1984 बैच के आइएएस थे। नीतीश केंद्र में रेल मंत्री थे, तो उनके निजी सचिव रहे। फिर वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके प्रमुख सचिव बन गए। आम धारणा हो गई कि नीतीश उन्हीं की सलाह से चलते हैं। नीतीश की सलाह पर 2010 में नौकरी छोड़ दी। जद (एकी) के राज्यसभा सदस्य बन गए। 2021 से 2022 तक केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री रहे। बीच में नीतीश ने उन्हें जद (एकी) का अध्यक्ष भी बनाया, पर 2022 में उनकी निकटता भाजपा से बढ़ गई तो नीतीश ने हाशिए पर पहुंचा दिया। अब चर्चा है कि नीतीश से मिलकर अपनी गलती की माफी मांग चुके हैं। पर जब तक ललन सिंह की सहमति नहीं होगी, तब तक नीतीश उन्हें पार्टी में शायद ही वापस लें।
कहीं पे निशाना
मुख्यमंत्री को घेरने के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार के कुछ मंत्री अब नौकरशाहों को निशाना बना रहे हैं, जिससे कांग्रेस पार्टी की अंतरकलह सतह पर आ रही है। शुरुआत की उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने राज्य सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर। कहा कि कुछ अधिकारी अभी भी सरकार के बजाय भाजपा नेताओं से निर्देश लेते हैं। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ आइएएस और आइपीएस अधिकारी हिमाचली हितों के विपरीत काम कर रहे हैं। जवाब दिया पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने, जिन्हें मुख्यमंत्री सुक्खू का नजदीकी माना जाता है। उन्होंने फरमाया कि अगर कोई मंत्री अपने काम नहीं कर पाता तो इसमें दोष किसी अधिकारी का नहीं। आइएएस और आइपीएस अधिकारियों के संगठन नेनाम लिए बिना बयान की निंदा की है।
विपक्ष का एक और हथियार
देश भर में चल रही मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की प्रक्रिया के तहत नई समय-सीमा ने भले ही सूची से बाहर रह गए मतदाताओं को एक राहत दी हो। लेकिन, इस पर विपक्ष को एक और सियासी हथियार मिल गया है। कई राज्यों में प्रक्रिया के लिए समय-सीमा बढ़ाने की मांग चल रही थी। इसी बीच निर्वाचन आयोग ने उन राज्यों समेत राजस्थान को भी यह अनुमति दी है। इस पर सियासी पारा चढ़ गया है। विपक्ष साफ तौर पर बिना आवश्यकता के समय सीमा बढ़ाने को लेकर मिलीभगत होने का आरोप लगा रहा है। विपक्ष अपने इन दावों के साथ अदालत में भी हाजिरी लगाने की तैयारी कर रहा है ताकि इस मसले पर आयोग अपना पक्ष अदालत में रखे।
सब दुखी
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के इस चरण की शुरुआत बिहार से हुई, और वहां हंगामा खूब बरपा। मगर पश्चिम बंगाल में इसका विचित्र असर दिख रहा है। चुनाव आयोग से न तो तृणमूल कांग्रेस खुश है और न ही भारतीय जनता पार्टी। हालांकि पहला चरण मोटे तौर पर इस सूबे में कामयाब रहा है। कुल 58 लाख लोगों के नाम कटे। पर, किसी खास जाति, मजहब या इलाके के लोगों के नाम ज्यादा कटने की शिकायत नहीं आई। इसके बावजूद ममता बनर्जी आयोग को चार पत्र लिख चुकी हैं। शिकायत है कि मामूली त्रुटि के आधार पर लोगों के नाम काटे जा रहे हैं। पूर्व में मतदाता सूची में सुधार के नाम पर नागरिकता परीक्षण करने का भी उन्होंने विरोध किया था। ममता का विरोध तो समझ आता है कि वे भाजपा की नीतियों का विरोध करती आई हैं। आयोग पर हमला तो भाजपा के सूबेदार शमिक भट्टाचार्य ने भी बोला है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर आयोग ने उनके कार्यकर्ताओं द्वारा भरे गए फार्म-7 के आधार पर मतदाता सूची में सुधार नहीं किया तो भाजपा चुनाव नहीं होने देगी। दरअसल भाजपा के अनेक नेता मानते हैं कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए बिना ममता को हराना मुश्किल होगा। अटकलें लगाई जा रही हैं कि अगर एसआइआर के बहाने बंगाल का विधानसभा चुनाव टला तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का बहाना मिल जाएगा। बंगाल अभी भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
प्रियंका से आस
प्रियंका गांधी के जन्मदिवस 12 जनवरी को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भीतर खासा जोश दिखा। प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने न केवल अपनी महासचिव का जन्मदिन मनाया, बल्कि अनेक राजनीतिक कार्यक्रम भी किए। उत्तर प्रदेश में पार्टी नेताओं ने अगले तीन महीने में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचकर जनसंपर्क का अभियान भी शुरू किया। दरअसल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय प्रियंका के करीबी माने जाते हैं। अब चर्चा शुरू हो गई है कि क्या प्रियंका फिर उत्तर प्रदेश की सियासत में वापसी करेंगी। राहुल अमेठी के और सोनिया रायबरेली से सांसद थे तो प्रियंका इन दोनों क्षेत्रों का काम देखती थीं और इस वजह से राज्य की राजनीति से उनका जुड़ाव था। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रियंका ने उत्तर प्रदेश में कुछ सक्रियता दिखाई थी, पर उनका सिक्का चल नहीं पाया था। फिलहाल वे केरल की वायनाड सीट से सांसद हैं, पर पार्टी का एक बड़ा वर्ग मानता है कि अगर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रियंका को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया जाए तो कांग्रेस बेहतर ढंग से लड़ पाएगी।
