महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। बीएमसी में भी बीजेपी का मेयर बनना लगभग तय माना जा रहा है। इस नतीजे के बाद सभी के मन में एक सवाल उठ रहा है- आखिर बीजेपी ने महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में इतना बड़ा कमबैक कैसे किया? और ठाकरे ब्रदर्स को करारी शिकस्त कैसे मिली?

बीजेपी के अंदरखाने से आ रही खबरों के मुताबिक, इस जीत में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की भूमिका बेहद अहम रही है। उन्होंने न सिर्फ रणनीति बनाई, बल्कि खुद मैदान में उतरकर चुनाव प्रचार की कमान संभाली। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में पार्टी सूत्रों ने जोर देकर कहा कि यह बड़ी जीत बेहतरीन प्लानिंग और बूथ स्तर तक कड़ी निगरानी का नतीजा है। रणनीति तैयार करने में देवेंद्र फड़नवीस ने केंद्रीय भूमिका निभाई।

खुद फड़नवीस ने जीत के बाद पार्टी मुख्यालय में कहा कि बीजेपी ने विकास का एजेंडा जनता के सामने रखा, जिसे लोगों ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि जनता ने पार्टी को रिकॉर्ड बहुमत देकर भरोसा जताया है। बालासाहेब ठाकरे का जिक्र करते हुए फड़नवीस ने कहा कि उनका आशीर्वाद भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना दोनों को मिला है। मुख्यमंत्री के मुताबिक यह जनादेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनता के विश्वास को भी दर्शाता है।

बीजेपी नेताओं का कहना है कि मुंबई में अच्छे प्रत्याशियों का चयन किया गया और पूरे चुनाव के दौरान सड़क सफाई, बुनियादी ढांचे और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस रखा गया। इसी रणनीति की वजह से पार्टी को उन इलाकों में भी समर्थन मिला, जहां शिवसेना में टूट के बाद समीकरण कमजोर हो चुके थे।

इस चुनाव को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पार्टी के लिए बड़ा लक्ष्य तय किया था—“शत-प्रतिशत बीजेपी” यानी 100 फीसदी प्रदर्शन। इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं था। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि स्थानीय स्तर पर कई जगहों पर भाजपा नेता निजी हितों को लेकर दूसरी पार्टियों से टकरा रहे थे। हालांकि, पार्टी स्तर पर बेहतर तालमेल बैठाया गया और गठबंधन को एकजुट रखते हुए मजबूती से चुनाव लड़ा गया।

जानकारों का मानना है कि देवेंद्र फड़नवीस ने इस स्थानीय निकाय चुनाव को विधानसभा चुनाव की तरह लड़ा। उन्होंने कई रैलियों को संबोधित किया और जिलों का लगातार दौरा किया। एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि उस समय उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ सक्रिय थे, जिससे मराठी अस्मिता का मुद्दा बड़ा बन सकता था। इसी वजह से रणनीतिक तौर पर फैसला लिया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्रचार के लिए नहीं बुलाया जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, बीजेपी नहीं चाहती थी कि ठाकरे खेमे को “एंटी-गुजरात” या “एंटी-नॉर्थ इंडिया” जैसे मुद्दे उछालने का मौका मिले। यह भी कहा जा रहा है कि कई सीटों पर महा विकास आघाड़ी एकजुट नहीं थी और उसने अलग-अलग उम्मीदवार उतारे, जिससे वोटों का बंटवारा हुआ। दूसरी ओर, बीजेपी ने महायुति के तहत सभी सहयोगियों को साथ रखने में कामयाबी हासिल की।

मराठी अस्मिता के मुकाबले बीजेपी ने इस बार के निकाय चुनाव में हिंदुत्व के मुद्दे पर ज्यादा फोकस किया। माना जा रहा है कि इससे मराठी वोटों में भले ही अपेक्षित बढ़त न मिली हो, लेकिन हिंदू मतों का ध्रुवीकरण जरूर हुआ। इसका असर मुंबई के बाहर भी देखने को मिला। नासिक, धुले, छत्रपति संभाजीनगर, अकोला और नांदेड जैसे जिलों में बीजेपी का प्रदर्शन इसी रणनीति की वजह से शानदार रहा।

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