बिहार विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों में भी अच्छी कामयाबी हासिल करने वाली बीजेपी की सबसे बड़ी परीक्षा पश्चिम बंगाल में होनी है। पश्चिम बंगाल में सरकार बनाना बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पुराना सपना है लेकिन अब तक उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी है। बीजेपी के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी पश्चिम बंगाल से थे। 

पश्चिम बंगाल में मार्च-अप्रैल में विधानसभा के चुनाव होने हैं और बीजेपी एक बार फिर से पूरी ताकत लगा रही है कि वह राज्य में ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेंके लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी? बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन की भी परीक्षा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में होनी है। 

पश्चिम बंगाल में बीजेपी को अगर सरकार बनानी है तो उसे इन पांच चुनौतियों से पार पाना होगा।

1- स्थानीय मजबूत चेहरे की कमी

बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुकाबले किसी स्थानीय मजबूत चेहरे का ना होना है। ममता बनर्जी साल 2011 से लगातार मुख्यमंत्री हैं। वह अपनी पार्टी की प्रमुख भी हैं और बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर अपनी पार्टी का चेहरा भी।

बीजेपी के सामने बड़ी मुश्किल यह है कि उसके पास स्थानीय स्तर पर ममता बनर्जी के कद का कोई नेता नहीं है। एक ऐसा नेता, जो ममता बनर्जी का मुकाबला कर सके। हालांकि पार्टी ने पिछले कुछ सालों में दिलीप घोष, शुभेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार को आगे लाने की कोशिश की लेकिन इनमें से कोई भी ममता बनर्जी के कद का सामना करने की स्थिति में नहीं दिखाई देता।

ऐसे में बीजेपी को ममता बनर्जी के मुकाबले में एक मजबूत बंगाली नेता की कमी जरूर खल रही है।

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2- महिला मतदाताओं पर ममता की पकड़ की काट खोजना जरूरी

ममता बनर्जी की छवि एक मुख्यमंत्री से ज्यादा महिला नेता वाली भी है। उन्हें एक ऐसी नेता के रूप में देखा जाता है जो बहुत सादगी भरा जीवन जीती हैं और केंद्र सरकार के साथ कई मुद्दों पर आमने-सामने की लड़ाई लड़ने की हिम्मत रखती हैं। उन्हें पश्चिम बंगाल में सम्मान से ‘दीदी’ कहा जाता है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार कन्या श्री, रूप श्री और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं चला रही है। कन्या श्री योजना के तहत लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने, रूप श्री योजना के तहत गरीब परिवारों की बेटियों को शादी के लिए 25000 की आर्थिक सहायता देने और लक्ष्मी भंडार योजना के तहत राज्य की महिलाओं को मासिक आर्थिक सहायता देने की स्कीम चलाई जा रही है। इन योजनाओं की वजह से महिलाएं ममता बनर्जी के साथ जुड़ी हुई हैं।

बीजेपी को अगर पश्चिम बंगाल में सरकार बनानी है तो उसे महिला मतदाताओं में अपना आधार बढ़ाना होगा।

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3- हिंदू मतदाताओं पर पकड़ करनी होगी मजबूत

पश्चिम बंगाल में बीजेपी को अपनी सरकार बनाने के लिए हिंदू मतदाताओं के एक बड़े बड़े हिस्से को अपने साथ लाना होगा। बंगाल में हिंदू जातियों में भद्रलोक, ओबीसी समुदाय, दलित जातियों में नामशूद्र, राजबंशी, मतुआ समुदाय आदि आते हैं।

बीजेपी को विशेषकर शहरी इलाकों में अच्छी मौजूदगी रखने वाले भद्रलोक यानी ऊंची जातियों के बीच अपने आधार को बढ़ाना होगा। पश्चिम बंगाल में हिंदू मतदाताओं के बीच आधार बढ़ाना बीजेपी के लिए इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मुस्लिम मतदाताओं का साथ उसे मिलना बेहद मुश्किल है।

सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर चल रहीं ममता

ममता बनर्जी हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर चल रही हैं। उन्होंने मंदिरों के विकास की बात कही है। हाल ही में उन्होंने सिलीगुड़ी में ‘महाकाल महातीर्थ मंदिर’ का शिलान्यास किया। ममता ने इसे देश का सबसे बड़ा महाकाल मंदिर बनाने की घोषणा की। चुनाव से पहले वह बंगाल में दूसरे विशाल मंदिर निर्माण परियोजना का शुभारंभ कर हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच को मजबूत कर रही हैं।

ममता सरकार ने दुर्गा पूजा, काली पूजा और गंगा सागर मेला को राजकीय संरक्षण दिया है। बीजेपी लगातार इस बात को कह रही है कि ममता बनर्जी की सरकार हिंदू विरोधी है लेकिन ममता बनर्जी ने अपने हालिया कदमों से बीजेपी को जवाब देने की कोशिश की है। ममता बनर्जी इस बात को जानती हैं और इसीलिए उन्होंने वक्फ कानून पर यू टर्न लेते हुए इसे राज्य में लागू करने का फैसला लिया था।

पश्चिम बंगाल में भद्रलोक यानी ऊंची हिंदू जातियों का बड़ा हिस्सा शहरी इलाकों में रहता है। यह वर्ग शिक्षित है और बंगाली अस्मिता को महत्व देता है ऐसे में बीजेपी को इस वर्ग का साथ हासिल करने के लिए निश्चित रूप से नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।

4- राष्ट्रवाद बनाम बंगाली अस्मिता का मुद्दा

बीजेपी का मुख्य चुनावी मुद्दा राष्ट्रवाद रहा है। पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी राष्ट्रवाद के मुद्दे को सामने रखकर चुनाव लड़ रही है लेकिन बंगाल में बंगाली उप राष्ट्रवाद का मुद्दा ताकतवर है। हालांकि राष्ट्रवाद, घुसपैठ, एनआरसी जैसे मुद्दों के दम पर बीजेपी ने बंगाल में अपना प्रदर्शन सुधारा है लेकिन पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह पिछली बार 77 सीटों तक ही पहुंच सकी थी।

बंगाली अस्मिता या बंगाली उप राष्ट्रवाद के मुताबिक, राज्य के लोगों की भाषा बांग्ला है और वह अपनी बांग्ला संस्कृति और पहचान को प्रमुखता देते हैं। पश्चिम बंगाल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बंकिम चंद्र चटर्जी, रविंद्र नाथ टैगोर जैसे तमाम बड़े लोग हैं जिससे बंगाली समाज खुद को जोड़ता है।

बीजेपी इस बार के चुनाव में बंगाली अस्मिता या बंगाली उप राष्ट्रवाद का मुकाबला कैसे कर पाएगी, यह आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा।

बीजेपी को बताया था ‘बाहरियों’ की पार्टी

ममता बनर्जी बार-बार बीजेपी को ‘बाहरियों’ की पार्टी बताती रही हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश, बिहार और दूसरे राज्यों से लोगों को बंगाल में लाया जा रहा है। उन्होंने पूरे चुनाव को ‘बंगाली बनाम बाहरी’ का मुद्दा बना दिया था और तब भी वह इस कड़े मुकाबले में बड़े अंतर से चुनाव जीती थीं।

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5- मुस्लिम मतों का बंटवारा होना जरूरी

बीजेपी को अगर पश्चिम बंगाल में सरकार बनानी है तो एक बड़ी शर्त है कि मुस्लिम मतों का बंटवारा होना चाहिए। पश्चिम बंगाल में इस बार विधायक हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक नई मस्जिद बनाने का ऐलान कर राजनीतिक हलचल पैदा कर दी थी। हुमायूं कबीर ने कहा है कि वह मुस्लिम बहुल सीटों पर उम्मीदवार खड़े करेंगे।

2021 के विधानसभा चुनाव में फुरफुरा शरीफ की ओर से कई सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए थे और एआईएमआईएम ने भी कुछ सीटों पर उम्मीदवारों को खड़ा किया था लेकिन मुस्लिम वोट टीएमसी के साथ ताकतवर ढंग से खड़ा रहा।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 30 से 32% है। 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को लगभग 75% मुस्लिम वोट मिले थे लेकिन इस बार अगर मुस्लिम मतदाताओं का कुछ हिस्सा हुमायूं कबीर, वाम दलों, कांग्रेस के पास चला जाता है तो इससे मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी की स्थिति कमजोर हो सकती है। ऐसी स्थिति में बीजेपी को फायदा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

बीजेपी को हो सकता है फायदा

हुमायूं कबीर आरोप लगा चुके हैं कि कि ममता बनर्जी ने मुसलमानों के लिए कुछ भी नहीं किया। अगर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है, तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर इसका सीधा फायदा बीजेपी को हो सकता है। बंगाल में करीब 90-100 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक स्थिति में हैं और इनमें से आधी सीटों पर भी मुस्लिम मतों का बंटवारा हुआ तो बीजेपी की राह कुछ हद तक आसान हो सकती है।

इसके अलावा एक मुद्दा घुसपैठ का भी है। बीजेपी लगातार कहती रही है कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ की वजह से मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है जबकि टीएमसी उसके आरोपों को नकारती रही है।

बीजेपी ने कुछ महीने पहले ही आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 37 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई लेकिन हिंदू मतदाताओं की संख्या केवल तीन लोकसभा सीटों पर ही दोगुनी हुई है। बीजेपी का आरोप है कि कोलकाता और इसके आसपास के उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों में बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर लोग आकर बस गए हैं।

अगर इस आधार पर मतों का ध्रुवीकरण हुआ तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच चुनावी मुकाबला बेहद नजदीकी हो सकता है।

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