अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2026 की शुरुआत में ‘ग्रीनलैंड मिशन’ लॉन्च किया। दुनियाभर में यह अब एक खबर नहीं बल्कि खतरे के रूप में देखा जा रहा है। ट्रंप के हालिया फैसलों से यह साफ हो गया है कि यूएस के साथ संभावित व्यापार समझौते के बाद भी भारत को अमेरिका के साथ संबंधों में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा जरूर करनी चाहिए।
गौर करने वाली बात है कि पिछले कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह धारणा मजबूत हुई थी कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते किसी देश को आर्थिक और रणनीतिक दबावों से सुरक्षा देते हैं। लेकिन जनवरी 2026 में सामने आया ग्रीनलैंड प्रकरण इस धारणा को तोड़ दिया और गंभीर चुनौती दी। यह घटना न केवल यूरोप और कनाडा के लिए चेतावनी है बल्कि भारत जैसे उभरते देशों के लिए भी एक बड़े सबक की तरह है कि ट्रेड डील अमेरिकी दबाव से सुरक्षा कवच नहीं होते।
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ग्रीनलैंड प्रकरण: एक खतरनाक संकेत
17 जनवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड से आने वाले आयात पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की। यह टैरिफ सीधे तौर पर ग्रीनलैंड से जुड़ा था क्योंकि इन देशों ने डेनमार्क के उस फैसले का समर्थन किया था जिसमें अमेरिका को ग्रीनलैंड पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण देने से इनकार किया गया।
यह टैरिफ 1 फरवरी से लागू होगा। ट्रंप ने खुले तौर पर कहा है कि अगर 1 जून 2026 तक ग्रीनलैंड की बिक्री पर कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ तो यह टैरिफ बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा। अमेरिकी प्रशासन ने साफ कहा कि यह तब तक जारी रहेगा जब तक अमेरिका ‘ग्रीनलैंड की संपूर्ण खरीद’ सुनिश्चित नहीं कर लेता। यह बयान अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादाओं के खुले उल्लंघन जैसा है।
ट्रेड डील: व्यापार नहीं, राजनीति का हथियार
ग्रीनलैंड की घटना यह दिखाती है कि अमेरिका टैरिफ और प्रतिबंधों का इस्तेमाल केवल व्यापार असंतुलन सुधारने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए भी करता है। इससे पहले वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों पर अमेरिकी नियंत्रण और वहां सत्ता परिवर्तन को कोशिश इसी पैटर्न को दोहराते हैं।
इस घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह है कि अमेरिका ने अपने करीबी सहयोगियों और व्यापारिक साझेदारों को भी नहीं बख्शा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि कोई भी देश- चाहे उसके पास व्यापार समझौता हो या सुरक्षा गठबंधन, अमेरिकी आर्थिक दबाव से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
यूरोप और कनाडा का बदला हुआ नजरिया
Global Trade Research Initiative (GTRI) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की इस ‘नापाक’ हरकत के बाद यूरोप में यूएस के प्रति भरोसा तेजी से कम हुआ है। कई सर्वे के मुताबिक, अब 76% जर्मन नागरिक अमेरिका को एक अविश्वसनीय साझेदार मानते हैं जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। यह स्थिति केवल जनमत तक सीमित नहीं है बल्कि नीति-निर्माण में भी दिखाई दे रही है।
कनाडा का उदाहरण और भी स्पष्ट है। अमेरिका का सबसे करीबी सुरक्षा साझेदार होने के बावजूद उसे 35% टैरिफ का सामना करना पड़ा। यूएसएमसीए जैसे व्यापार समझौते को ‘अप्रासंगिक’ करार दिया गया और यहां तक कि कनाडा को अमेरिका का “51वां राज्य” कहने जैसी बयानबाजी भी हुई। इसके जवाब में कनाडा ने चीन के साथ आठ नए समझौते किए और आज चीन, कनाडाई कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है।
ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने चीन के साथ रिश्ते फिर से मजबूत किए जबकि ब्रिटेन की नई सरकार चीन दौरे की तैयारी कर रही है। मैसेज एकदम साफ है- देश अब अमेरिका पर एकतरफा निर्भरता नहीं रखना चाहते।
भारत के लिए क्या है मैसेज?
वेनेजुएला और खासकर ग्रीनलैंड की घटना के बाद कुछ बड़े सबक सामने आए हैं। पिछले कुछ सालों में अमेरिका के दबाव में भारत ने कई रणनीतिक फैसले लिए हैं। इनमें से कुछ इस तरह हैं:
-ब्रिक्स देशों के नौसैनिक अभ्यास से पीछे हटना
-दशकों के निवेश के बाद चाबहार पोर्ट परियोजना से दूरी
-ईरान और वेनेजुएला से तेल आयात बंद करना
-रूस से ऊर्जा आयात में भारी कटौती
इन सबके बावजूद भारत पर अमेरिकी दबाव कम नहीं हुआ है और ना ही ट्रेड डील को लेकर जारी बातचीत में यूएस का रुख नरम पड़ा है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि रियायतें स्थिरता की गारंटी नहीं देतीं।
‘टेक्नोलॉजी और संप्रभुता का सवाल’
रिपोर्ट में ईरान का उदाहरण देकर यह भी चेतावनी दी गई है कि टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म- खासकर सैटेलाइट नेटवर्क जैसे स्टारलिंक, राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए चुनौती बन सकते हैं। ईरान में जब तक स्टारलिंक सक्रिय रहा, विरोध प्रदर्शनों के वीडियो वैश्विक स्तर पर फैलते रहे।
भारत में भी स्टारलिंक के कमर्शियल लॉन्च की तैयारियां चल रही हैं। अगर भारत एक ऐसे नेटवर्क को अनुमति देता है तो उसे केवल डिजिटल कनेक्टिविटी नहीं बल्कि रणनीतिक जोखिम के रूप में भी देखना होगा।
भारत का सुरक्षित रास्ता क्या है?
भारत के लिए चीन की ओर पूरी तरह झुकना भी व्यावहारिक विकल्प नहीं है। सीमा विवाद, व्यापार घाटा और पाकिस्तान को लेकर चीन की भूमिका इसकी सीमाएं तय करती है। ऐसे में भारत के पास सबसे सुरक्षित मार्ग है-
-रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना
-साझेदार देशों में विविधता लाना
-हर समझौते में पारस्परिकता पर जोर देना
-ऊर्जा, तकनीक और क्षेत्रीय संपर्क में अपना संतुलन और दबाव बनाए रखना
‘संयम ही शक्ति है’
ग्रीनलैंड प्रकरण से ट्रंप का संदेश साफ है- अमेरिकी व्यापार समझौते सुरक्षा कवच नहीं बल्कि अस्थाई व्यवस्था हैं। राजनीतिक फैसले लेकर उन्हें कभी भी बदला जा सकता है। भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि वह तात्कालिक लाभ या वादों के बदले अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता न करे।
भारत-अमेरिकी ट्रेड डील और इस पूरे प्रकरण पर जीटीआरआई के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा, ”ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय सहयोगी देशों पर अमेरिकी टैरिफ लगाने का फैसला एक ऐसी वास्तविकता को उजागर करता है जिसे भारत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। वॉशिंगटन के साथ व्यापार समझौते कोई सुनिश्चित सुरक्षा प्रदान नहीं करते, खासकर जब आर्थिक उपायों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव के लिए किया जाता है। यूरोप का अनुभव-जैसे इससे पहले कनाडा के साथ हुआ व्यवहार और उसके बाद ऑस्ट्रेलिया द्वारा अपनाई गई संतुलन की नीति- दिखाता है कि करीबी सहयोगियों को भी अचानक टैरिफ कार्रवाई से नहीं बख्शा जाता।
भारत पहले ही चाबहार से पीछे हटने, ऊर्जा आयात में बदलाव करने और ब्रिक्स के भीतर अपनी भागीदारी सीमित करने जैसी कीमत चुका चुका है। फिर भी उसे व्यापार वार्ताओं में लगातार दबाव का सामना करना पड़ रहा है। सबक साफ है- किसी अमेरिकी व्यापार समझौते से स्थिरता की उम्मीद में नई दिल्ली को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का सौदा नहीं करना चाहिए। अस्थिर वैश्विक व्यवस्था में संयम, विविधीकरण और संप्रभु निर्णय-क्षमता, उन वादों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं जिन्हें रातोंरात वापस लिया जा सकता है।”
