महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों के नतीजे आ चुके हैं। राज्य में भाजपा विधानसभा चुनावों के बाद एक बार फिर से सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। भाजपा ने राज्य के 29 नगर निगमों में से 1425 सीटें जीती है। बता दें कि महाराष्ट्र के 29 नगर निगम के चुनावों में 2869 सीटें हैं।

अंतिम परिणाम में भाजपा को 1425, शिवसेना (शिंदे गुट) को 399, कांग्रेस को 324, एनसीटी (अजित गुट) को 167, शिवसेना (यूबीटी) को 155, एनसीपी शरद पवार गुट को 36 और एमएनएस को 13 और बसपा को कुल 06 सीटें हासिल हुई हैं।

ठाकरे और पवार परिवार के गढ़ में सेंध

एक तरफ जहां इस स्थानीय नगर निकाय चुनावों में बीजेपी की बढ़त हुई है तो वहीं, दूसरी ओर ठाकरे बंधुओं और पवार धड़ों की पकड़ अपने कोर वोटर से भी छूटती नजर आई है। बीएमसी में जहां महायुति गठबंधन (भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट)) ने ठाकरे बंधुओं के तीन दशक पुराने वर्चस्व को समाप्त कर दिया। तो पुणे भी पवार परिवार को करारा झटकरा मिला और भाजपा ने पवार परिवार के गढ़ में 119 सीटें जीत लीं। यहां एनसीपी-अजित पवार गुट को 27 तो एनसीपी शरद पवार गुट को महज तीन सीटें ही हासिल हुईं।

साथ ही पिंपरी-चिंचवड में भी अजित पवार की एनसीपी ने वोट की लालच में बीजेपी के खिलाफ अपने चाचा शरद पवार के साथ गठबंधन किया था, यहां भी उन्हें बीजेपी से करारी हार मिली।

इधर शिवसेना और मनसे का गठबंधन असफल रहा तो उधर पवार परिवार का एक्सपेरिमेंट भी धरा का धरा रह गया। हालांकि शिवसेना (यूबीटी) ने बीएमसी में जीत हासिल कर दूसरी बड़ी पार्टी बनी है, यहां उसे 65 सीटें हासिल हुई हैं। ऐसे में अगर कोई सबसे बड़ा ‘लूजर’ साबित हुआ है तो वह एनसीपी के अजित पवार हैं।

कारण बताते हैं कैसे?

महाराष्ट्र में वह महायुति गठबंधन में शामिल हैं, यानी वह मौजूदा राज्य सरकार का हिस्सा हैं। इसके बावजूद उन्होंने स्थानीय नगर निकाय में गठबंधन को ठेंगा दिखाते हुए अपने चाचा शरद पवार के साथ गठबंधन किया। बता दें कि पहले राजनीतिक लाभ के लिए उन्होंने अपने चाचा की पार्टी (एनसीपी) को ही उन्होंने तोड़कर दो भागों में बांट में दिया।

इसके अलावा, अजित पवार ने महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव में घूम-घूमकर बीजेपी के खिलाफ ही बढ़-चढ़कर बोला। माना जा रहा कि इससे बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी व्याप्त हो गई है।

तीसरी वजह की उन्होंने जो सोचकर चाचा के साथ हाथ मिलाया था उनसे उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि अपने गठबंधन महायुति से अलग होकर उन्होंने नुकसान ही किया है। इस नगर निकाय में उनकी पार्टी का कोई भी मेयर नहीं बन रहा, बस कुछ पार्षद ही हैं जिन्होंने अपनी जीत जीतकर इनका नाम बचा लिया वरना राज्य के इस स्थानीय चुनाव से उनका सूपड़ा साफ हो जाता।

भाजपा ने बनाई क्षेत्रीय दलों से बेहतर पकड़

एशिया की सबसे अमीर नगर निकाय बीएमसी में अजित गुट को तीन सीट तो शरद पवार गुट की एनसीपी को एक ही सीट हासिल हुई है। जबकि शिवसेना (शिंदे गुट) के साथ लड़ी बीजेपी को 89 तो शिंदे गुट की पार्टी को 29 सीट हासिल हुई है। यह बताता है कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों से बेहतर पकड़ स्थानीय स्तर पर भी बना ली है। करारी हार के बाद उन्होंने हार को स्वीकार करते हुए कहा कि जनता की इच्छा ही सर्वोपरि है।

ऐसे में अजित पवार के लिए यह कहावत सही है कि न माया मिली न राम… क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र में अपना प्रभाव बनाने के लिए अपने चाचा के साथ हाथ मिलाया इसका उन्हें कुछ खास फायदा नहीं हुआ बल्कि अपने सहयोगी पार्टी (महायुति) को नाराज कर लिया। हो सकता है यह नाराजगी आगे कभी हमें देखने को भी मिले। आगे पढ़िए बीएमसी नगर मेयर चुनाव: क्या शिंदे की शिवसेना पर भारी पड़ेगी ‘बड़े भाई’ की दावेदारी?