अमेरिका की ओर से व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर एक बड़ा दावा किया गया है। कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत नहीं होने की वजह से भारत-अमेरिका ट्रेड डील पूरी नहीं हो सकी।

इन दावों पर विदेश मंत्रालय ने अपना रुख साफ कर दिया है। मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच कई मौकों पर बातचीत हुई है और यह कहना गलत है कि दोनों नेताओं के बीच संपर्क नहीं रहा।

इस पूरे मामले को समझने के लिए घटनाओं की क्रमवार टाइमलाइन (क्रोनोलॉजी) पर नजर डालना जरूरी है। दरअसल, अमेरिकी अधिकारी लटनिक की ओर से संकेत दिए गए थे कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील उस समय अंतिम चरण में थी, जब अमेरिका ने 8 मई को ब्रिटेन और 2 जुलाई को वियतनाम के साथ अपना व्यापार समझौता पूरा किया। उसी दौरान भारत के साथ डील नहीं हो पाई।

अमेरिकी पक्ष का दावा है कि इसकी वजह यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद राष्ट्रपति ट्रंप से बातचीत नहीं की। हालांकि, भारत इस दावे को खारिज करता रहा है।

जानकारी के लिए बता दें कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत 7 मई को पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को निशाना बनाकर तबाह कर दिया था। यह कार्रवाई पाकिस्तान की ओर से की गई उकसावे वाली गतिविधियों के जवाब में की गई थी। इसके बाद करीब चार दिनों तक भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना रहा और 10 मई को संघर्षविराम (सीजफायर) की घोषणा हुई।

राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया था कि यह संघर्षविराम अमेरिका की मध्यस्थता से संभव हो पाया, लेकिन भारत ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। भारत ने साफ कहा कि संघर्षविराम पाकिस्तान की पहल पर और द्विपक्षीय बातचीत के जरिए हुआ था।

ऑपरेशन सिंदूर के कुछ हफ्तों बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने अलग-अलग मंचों पर बार-बार सीजफायर को लेकर अपनी भूमिका का दावा किया। इन्हीं दावों के बीच अमेरिका की ओर से यह तर्क सामने आया कि प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप से सीधे बातचीत करनी चाहिए थी।

इस दौरान एक और अहम मुद्दा सामने आया। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहा था और धीरे-धीरे रूस भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बन गया। इसी वजह से अमेरिका ने भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी।

अमेरिकी दावे के मुताबिक, ट्रेड डील बेहद करीब थी, लेकिन भारत ने यह मौका गंवा दिया, क्योंकि तब तक अमेरिका वियतनाम, इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ समझौते कर चुका था। यहां तक कहा गया कि राष्ट्रपति ट्रंप अलग तरीके से डील करते हैं—जो देश पहले आता है, उसे कम टैरिफ का फायदा मिलता है।

हालांकि, इन दावों की हकीकत पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ और ही दिखती है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका ने ब्रिटेन पर सबसे कम टैरिफ लगाया और वियतनाम पर 20 प्रतिशत टैरिफ, जिसे भी अपेक्षाकृत कम माना गया। लेकिन इसके बाद भी अमेरिका ने दक्षिण कोरिया, जापान जैसे कई अन्य देशों पर भी कम टैरिफ लगाए।

अगर “पहले आने वाली बात” की थ्योरी को मान लिया जाए, तो भारत और अमेरिका के बीच बातचीत तो काफी समय से चल रही थी। यही नहीं, राष्ट्रपति ट्रंप ने कभी भी खुलकर रूस से तेल आयात को लेकर कड़ा विरोध नहीं जताया था। उस समय तक यह मुद्दा भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बीच कोई बड़ी बाधा भी नहीं बन रहा था।

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