हर दंपत्ति अपने जीवन में कभी ना कभी उस पड़ाव पर आता है, जब वो अपने पेरेंटहुड की ख्वाहिश को साकार करना चाहता है, लेकिन कभी-कभी नैचुरल कन्सेप्शन कठिन हो सकता है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे उम्र, हार्मोनल इम्बैलेंस, ओवरीज से जुड़ी समस्याएं, ट्यूब्स में ब्लॉकेज या पुरुष में शुक्राणु की संख्या या क्वालिटी से जुड़ी दिक्कतें। ऐसी स्थिति में मेडिकल साइंस की एडवांस्ड तकनीक, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ दंपत्ति के लिए संतान प्राप्ति को लेकर एक नई रोशनी लेकर आती है। बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, प्रयागराज में प्रजनन विशेषज्ञ, मधुलिका सिंह ने विश्व आईवीएफ दिवस के मौके पर बताया कि आईवीएफ का लाभ कैसे उठाया जा सकता है और ये किसके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

क्यों मनाया जाता है विश्व आईवीएफ दिवस

दरअसल, हर साल 25 जुलाई को विश्व आईवीएफ दिवस मनाया जाता है। यह दिन चिकित्सा, खासकर प्रजनन और प्रजनन क्षमता के क्षेत्र में तकनीक की प्रगति और पहुंच का प्रतीक है। विश्व आईवीएफ दिवस, लुईस ब्राउन के जन्म की याद में मनाया जाता है, जो 25 जुलाई, 1978 में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन के जरिए गर्भाधान के जरिए पैदा हुई पहली संतान थीं।

क्या है आईवीएफ

आईवीएफ की प्रक्रिया को समझना बेहद जरूरी है, ताकि इससे जुड़ी मिथक और डर को दूर किया जा सके। इस तकनीक में महिला के एग्स और पुरुष के शुक्राणु को एक लैब में फर्टिलाइज किया जाता है। फर्टिलाइजेशन के बाद एम्ब्र्यो बनता है, जिसे महिला के यूट्रस में ट्रांसफर किया जाता है। यदि सब कुछ नॉर्मल रहता है, तो वही एम्ब्र्यो प्रेगनेंसी में परिवर्तित होता है।

आईवीएफ किसके लिए फायदेमंद

आईवीएफ उन दंपत्तियों के लिए सबसे कामयाब साबित होता है, जिनकी फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं का पता चल जाए। उदाहरण के तौर पर जिन महिलाओं को ओव्यूलेशन में समस्या हो या जिनकी फॉलोपियन ट्यूब्स बंद हों या फिर जिनकी उम्र ज्यादा हो या जिन्हें एंडोमेट्रियोसिस जैसी कंडीशंस हो, उनके लिए आईवीएफ एक कारगर विकल्प है। इसी तरह जिन पुरुषों में शुक्राणु की संख्या बहुत कम हो या शुक्राणु की मोटिलिटी में कमी हो, उनके लिए आईवीएफ सफल हो सकता है। इसके अलावा जिन दंपत्तियों ने पहले कई बार IUI या अन्य ट्रीटमेंट्स करवाए हैं और उन्हें सफलता नहीं मिली, वे भी IVF का लाभ उठा सकते हैं।

आईवीएफ एक मेडिकल प्रोसेस है, जो हर पेशेंट की जरूरत और कंडीशन के अनुसार की जाती है। कभी-कभी इसमें एग्स या स्पर्म डोनर की आवश्यकता होती है और कुछ मामलों में फ्रीज किए गए एंब्रोज का इस्तेमाल भी किया जाता है। कई सेंटर्स अब जेनेटिक टेस्टिंग जैसी एडवांस्ड तकनीकों का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे एम्ब्र्यो की क्वालिटी और प्रेगनेंसी की संभावनाओं को बेहतर समझा जा सकता है।

आईवीएफ को हर अलग समस्या के हिसाब से पर्सनलाइज्ड किया जाता है। जिन मरीजों को कैंसर की तरह कोई गंभीर बीमारी हो और वो कीमोथेरेपी करवा रहे हो या करवा चुके हों या जिनकी ओवरी में एग रिलीज लगभग बंद हो चुका हो, वहां आईवीएफ में अलग रास्ता जैसे की डोनर का भी सुझाव दिया जा सकता है।

आईवीएफ के दौरान पेशेंस, समय और सही जानकारी की आवश्यकता रहती है। यही वजह है कि किसी योग्य और अनुभवी डॉक्टर की निगरानी में इसे करवाना सबसे जरूरी होता है। सही मार्गदर्शन और सपोर्ट के साथ यह प्रक्रिया कई दंपत्तियों के लिए पेरेंटहुड की राह को संभव बना चुकी है। आईवीएफ केवल एक तकनीक नहीं है, बल्कि पॉसिबिलिटी बढ़ाने का एक रास्ता है। यह उन लोगों के लिए एक नई शुरुआत का अवसर है, जो कई वर्षों से पेरेंट्स बनने की चाह में हैं। अगर सही समय पर सही जानकारी और परामर्श लिया जाए, तो आईवीएफ आज के दौर में एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बन रहा है।

कब करवाएं एग फ्रीजिंग

एग फ्रीजिंग के लिए सबसे अच्छा समय 20 के दशक के अंत से 30 के दशक की शुरुआत तक माना जाता है। इस उम्र में अंडे की गुणवत्ता और मात्रा आमतौर पर अच्छी होती है, जिससे भविष्य में सफल गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा एग फ्रीजिंग के लिए सही उम्र व्यक्ति की व्यक्तिगत परिस्थितियों, जैसे कि करियर, रिश्ते और भविष्य की योजना पर भी निर्भर करती है।

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