सर्दियों का नाम आते ही हर घर में सरसों के साग और मक्के की रोटी की चर्चा होने लगती है। आयुर्वेद के अनुसार सभी साग एक जैसे गुणों वाले नहीं होते। स्वाद भले ही पकने के बाद मिलते-जुलते हों, लेकिन शरीर पर इनका प्रभाव अलग-अलग होता है। इसी वजह से आयुर्वेद कुछ सागों को अधिक गुणकारी और कुछ को सीमित मात्रा में खाने की सलाह देता है। सरसों का साग एक ऐसा साग है जिसे आयुर्वेद में कम खाने की सलाह दी गई है। आयुर्वेद और मशहूर एक्सपर्ट नित्यानंदम श्री के अनुसार हर किसी के लिए सरसों का साग फायदेमंद नहीं होता?
ये साग भारी होने के कारण कई बार पाचन को धीमा कर देता है। इसकी जगह प्रकृति ने हमें सर्दियों में बथुआ और चौलाई दो ऐसे साग दिए हैं जो औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। ये साग पेट की अंदरूनी सफाई करने में माहिर हैं। अगर आप गैस, कब्ज या खराब पाचन से परेशान हैं, तो इन दो सागों को उबालकर या पकाकर खाने से आपका पाचन तंत्र फिर से जीवित हो सकता है। आइए जानते हैं क्यों नित्यानंदम श्री बथुआ और चौलाई को सरसों के साग से बेहतर विकल्प बताते हैं।
सरसों का साग क्यों सेहत के लिए सुरक्षित होता है?
आयुर्वेद में सरसों के साग को बाकी साग में अपेक्षाकृत निंदित माना गया है। माना जाता है कि यह भारी होता है, पाचन शक्ति को कमजोर करता है, वात व कफ को बढ़ाता है। नियमित सेवन से गैस, सांस से जुड़ी समस्याएं, बालों का जल्दी सफेद होना और बुढ़ापा जल्दी आने जैसी परेशानियां हो सकती हैं। खासकर बासी या बार-बार गर्म किया गया सरसों का साग सेहत के लिए नुकसानदेह माना गया है।
बथुए का साग क्यों है बेहतर विकल्प
बथुए का साग आयुर्वेद में शकराज यानी सागों का राजा कहा गया है। यह हल्का, आसानी से पचने वाला और पेट साफ रखने वाला माना जाता है। ये साग कब्ज नहीं होने देता और पाचन तंत्र को मजबूत करता है। आयुर्वेद के अनुसार बथुआ आंखों की रोशनी बढ़ाने में सहायक है। ये बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर पाचन वाले लोगों के लिए सुरक्षित माना जाता है।
बथुआ पाचन के लिए कैसे अमृत है?
बथुआ (Chenopodium album) को आयुर्वेद में तो ‘पाचन का राजा’ माना ही गया है, आधुनिक विज्ञान और शोध (Modern Research) भी इसके औषधीय गुणों की पुष्टि करते हैं। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार बथुआ में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है। यह ‘बल्क’ बनाकर मल त्याग (Bowel movement) को आसान बनाता है। ये पुराने से पुराने कब्ज को ठीक करने में मदद करता है। फाइबर आंतों के मार्ग को साफ रखता है जिससे टॉक्सिन्स शरीर में जमा नहीं हो पाते। जर्नल ऑफ एथ्नो फार्माकोलॉजी’ में छपी रिसर्च के मुताबिक बथुआ में हल्के लैक्सेटिव गुण होते हैं। ये पेट को बिना नुकसान पहुंचाए प्राकृतिक रूप से साफ करता है। जहां दूसरी दवाएं आंतों को सुस्त बना सकती हैं, वहीं बथुआ आंतों की मांसपेशियों (Peristalsis) को मजबूती देता है।
बथुआ के साग के प्रमुख फायदे
बथुए का साग मोटापा नहीं बढ़ाता, पेट फूलने की समस्या में राहत देता है और जोड़ों के दर्द, सूजन व गठिया जैसी स्थितियों में भी सुरक्षित माना जाता है। यह कफ नाशक है, इसलिए दमा, ब्रोंकाइटिस और बलगम से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी बताया गया है। साथ ही यह शरीर को हल्कापन और अच्छी भूख देता है।
बथुआ के साथ कौन-सी रोटी बेहतर
आयुर्वेद के अनुसार बथुआ के साग के साथ बाजरे की रोटी सबसे अधिक गुणकारी मानी जाती है। दोनों एक-दूसरे को पचाने में मदद करते हैं। घी के साथ सेवन करने से इसके फायदे और बढ़ जाते हैं। चाहें तो बथुआ और चौलाई के पत्तों को आटे में मिलाकर पौष्टिक रोटी भी बनाई जा सकती है।
चौलाई का साग भी है गुणकारी
बथुआ की तरह चौलाई का साग भी हल्का और पाचन के लिए अच्छा माना जाता है। यह भी आंखों के लिए लाभकारी है और शरीर में सूजन व भारीपन नहीं बढ़ाता। इन दोनों सागों को आयुर्वेद में सुरक्षित और नियमित सेवन योग्य बताया गया है।
डिस्क्लेमर
यह स्टोरी सामान्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार की गई है। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संबंधी बदलाव या डाइट में परिवर्तन करने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
खाने के बाद 1 गिलास गर्म दूध में इन 2 चीजों को मिलाकर पी लें, पेट में जमा मल भड़भड़ाकर निकल जाएगा बाहर, आंतों की हो जाएगी सफाई
