Kuttey Movie Review: फिल्मकार- संगीतकार विशाल भारद्वाज के बेटे आसमान भारद्वाज ने इस फिल्म के साथ ही बॉलीवुड में बतौर निर्देशक पदार्पण कर लिया है। फिल्म की कहानी बेहद लचर, अविश्वसनीय और पकाऊ है जिसकी वजह से फिल्म ढीली-ढाली हो गई है। इतना जरूर है कि विशाल भारद्वाज का संगीत दमदार है और वो फिल्म को पूरी तरह लटकने से बचा लेता है।

कैसी है कुत्ते?

अब दूसरा सवाल ये उठता है कि फिल्म में कुत्ते किसको कहा गया है। सीधा जवाब है- पुलिस वालों को, क्योंकि इसमें सभी पुलिसवाले महाभ्रष्ट हैं। इतने कि आम लोगों ने ही नहीं, अपनो से भी पैसे खाते हैं। गोपाल (अर्जुन कपूर) और पाजी (कुमुद मिश्रा) इसमें ऐसे पुलिस वाले बने हैं जिनके अपने गोरखधंधे और वे इसमें दोनो ऐसे फंस जाते है कि निकलना मुश्किल लगता है। फिर दोनों बड़ी पुलिस अधिकारी पम्मी (तब्बू) के पास जाते हैं जो कहती है कि एक मोटी रकम लाओ फिर देखते हैं क्या हो सकता है। इसके बाद यही पुलिसवाले मिलकर नोटों से भरी एक गाड़ी को लूटने की योजना बनाते हैं। फिर भाऊ (नसीरुद्दीन शाह) नाम का ड्रग माफिया सरदार भी है जिसके अपने खेल हैं जिसमें पुलिसवाले उसके सहयोगी हैं। क्या होगा इन पुलिसवालों और माफिया सरदार का- यही प्रश्न इस फिल्म का मूल आकर्षण है।

फिल्म की पटकथा पूरी तरह से इन चरित्रों को उभार नहीं पाती इसलिए दर्शक को आखिर तक समझ में नहीं आता कि ये सब क्या हो रहा था। क्लाइमेक्स की सीन भी भ्रमित करने वाला है। फिल्म पर नक्सलवाद की छाया भी है और कोंकणा एक नक्सल बनी है। इसका भी कोई औचित्य पूरी फिल्म को देखने के बाद समझ में नहीं आता। जाहिर है कि सिनेमा हॉल से निकलने के बाद आप पूछेंगे कि ये इतने सारे चोचे के मुरब्बे क्यों?