अभिनेता दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा (The Substance and the Shadow: An Autobiography) में धर्मेंद्र से जुड़ा एक किस्सा साझा किया है। उस जमाने में फिल्मी सितारों के घर के बाहर आज जैसी सिक्योरिटी नहीं रहती थी। एक दिन एक नौजवान दिलीप कुमार के बंगले में घुस गया और अन्दर वहाँ तक पहुँच गया जहाँ दिलीप जी झपकी ले रहे थे। आहट से दिलीप कुमार की नींद खुली तो सामने एक अजनबी को देखकर वह चिल्ला पड़े। वह अजनबी दिलीप कुमार के जागते ही भाग खड़ा हुआ।

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इस घटना के कई साल बाद अभिनेता धर्मेंद्र दिलीप कुमार से मिले और उन्हें वह घटना याद दिलायी। तब दिलीप कुमार को पता चला कि वह अजनबी कोई और नहीं बल्कि हिन्दी सिनेमा के ही-मैन धर्मेंद्र थे। अपने इंटरव्यू में धर्मेंद्र ने उस घटना को याद करते हुए बताया था कि वह लुधियाना से मुंबई आए थे। वो दिलीप कुमार को बेइंतहा पसन्द करते थे इसलिए उनसे मिलने घर चले गये। गेट पर किसी को न पाकर अन्दर चले गये मगर दिलीप कुमार को अचानक सामने देखकर वह घबरा गये।

एक दूसरे सीन में बीते जमाने की कुछ अभिनेत्रियाँ एक टीवी शो में पुराने दिनों को याद कर रही होती हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि उनके जमाने में सबसे हैंडसम हीरो कौन था तो ज्यादातर धर्मेद्र का नाम लेती हैं। लम्बी-चौड़ी कद-काठी और खूबसूरत नैन-नक्श वाले धर्मेंद्र के लुक्स पर फिदा होने वाली इन अभिनेत्रियों ने हिन्दी सिनेमा के कई नामी अभिनेताओं के साथ काम किया था।

एक तीसरे सीन में धर्मेंद्र अपने फार्म-हाउस में बिल्कुल देसी लिबास में खेती करते नजर आते हैं। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर हजारों लोग शेयर और लाइक करते हैं। धर्मेंद्र के लिए प्यार भरे कमेंट करते हैं।

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ये तीन छवियाँ धर्मेंद्र के व्यक्तित्व के उन तीन पहलुओं को उजागर करती हैं जो रुपहले पर्दे की छवि से बाहर के धर्मेंद्र की आखिरी साँस तक पहचान रहे।

आज की पीढ़ी धर्मेंद्र को सबसे ज्यादा कालजयी फिल्म ‘शोले’ के लिए याद करती है। ‘शोले’ 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी। पिछले 50 साल में ‘शोले’ ने कल्ट का दर्जा हासिल कर लिया है।

धर्मेंद्र का जन्म लुधियाना में 8 दिसंबर 1935 को हुआ था। उनका पूरा नाम धर्मेंद्र केवल कृष्ण देओल था। उन्होंने 1960 में हिन्दी फिल्मों में पदार्पण किया। उनकी पहली फिल्म थी, ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे।’ बलराज साहनी और कुमकुम इस फिल्म में उनके सह-कलाकार थे। अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म में उन्हें ‘धर्मेंद्र’ के नाम से प्रस्तुत किया गया और यही उनका फिल्मी नाम बन गया।

धर्मेंद्र की पहली फिल्म को आज इसलिए ही याद किया जाता है क्योंकि वह धर्मेंद्र की पहली फिल्म थी। डेब्यू करने के तीन साल बाद ही 1963 में धर्मेंद्र को बिमल रॉय की बंदिनी में महान अभिनेत्री नूतन के साथ काम करने का मौका मिला। बंदिनी ने उस साल सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था।

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अगले ही साल 1964 में चेतन आनन्द की फिल्म हकीकत आई जिसमें धर्मेंद्र भी एक अहम भूमिका में थे। इस फिल्म को भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1966 में मीना कुमारी और धर्मेंद्र की फिल्म “फूल और पत्थर” आयी जो उस साल की सबस बड़ी हिट साबित हुई। कई आलोचक इस फिल्म को धर्मेंद्र के करियर का टर्निंग प्वाइंट मानते हैं। 1968 में हृषिकेश मुखर्जी की सत्यकाम आयी जिसमें धर्मेंद्र के अभिनय को सभी ने सराहा। इस फिल्म को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

धर्मेंद्र की फिल्मोग्राफी देखें तो 1960 के दशक में वह मसाला फिल्मों के साथ-साथ हिन्दी सिनेमा के सबसे कलात्मक निर्देशकों के साथ लगातार काम करते रहे। इस दौरान बिमल रॉय, चेतन आनन्द, हृषिकेश मुखर्जी, असित सेन, फणी मजूमदार और अभी भट्टाचार्य जैसे निर्देशकों की फिल्मों में संवेदनशील भूमिकाएँ निभाने वाले धर्मेंद्र 1970 के दशक में एक्शन फिल्मों की तरफ झुकने लगे। या यूँ कह लें कि 1970 के दशक की कुछ कल्ट एक्शन फिल्मों ने उन्हें ही-मैन की इमेज दिला दी।

1970 में धर्मेंद्र राज कपूर की कल्ट-क्लासिक ‘मेरा नाम जोकर’ में नजर आए। 1970 में ही उन्होंने हेमा मालिनी के साथ पहली फिल्म “तुम हसीं मैं जवाँ” की। फिल्मों में से आने से पहले ही 1954 में धर्मेंद्र की प्रकाश कौर से शादी हो चुकी थी। कई फिल्मों में साथ काम करने के बाद 1980 में धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी से विवाह किया।

1971 में राज खोसला की ‘मेरा गाँव मेरा देश’ और ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गुड्डी’ आयीं। ‘मेरा गाँव मेरा देश’में डाकुओं की कहानी थी। इस फिल्म की जबरदस्त सफलता ने उस दशक के कई फिल्मों में धर्मेंद्र को डाकू की भूमिका दिलवायी। मगर जो फिल्म “शोले” उन्हें सर्वाधिक ख्याति दिलाने वाली थी उसमें वह डाकुओं से लड़ते नजर आए।

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‘सीता और गीता’, ‘राजा जानी’, ‘जुगनू’और चुपके-चुपके जैसी फिल्मों ने उन्हें अपने समय के सबसे बड़े स्टार में शुमार करा दिया। शोले की ऐतिहासिक सफलता के बाद धर्मेंद्र टफ रोल में टाइप-कास्ट होने लगे। 1980 के दशक में आईं उनकी ज्यादातर चर्चित फिल्में एक्शन प्रधान थीं। 1983 में वह कमाल अमरोही की ‘रजिया सुल्तान’ में नजर आए मगर इस दौर में आईं उनकी एक्शन फिल्मों ने उन्हें ही-मैन की छवि तक सीमित कर दिया।

बढ़ती उम्र ने धीरे-धीरे धर्मेंद्र की फिल्मी सफलता को कुंद कर दिया मगर उनका स्टारडम कभी कम नहीं हुआ। इसमें थोड़ा योगदान उनके अभिनेता बेटों सनी देओल और बॉबी देओल का भी है। इन दोनों ने अपना नाम करने के साथ ही पिता का नाम भी जिन्दा रखा। इन दोनों को धर्मेंद्र ने अपने होम-प्रोडक्शन की फिल्मों से लॉन्च किया था।

साल 2004 में धरम जी ने भाजपा के टिकट पर बीकानेर से लोक सभा चुनाव लड़ा और जीता। राजनीति उनके मिजाज से मेल नहीं खायी इसलिए उसके बाद उन्होंने इससे किनारा कर लिया। भारत सरकार ने कला जगत में उनके योगदान के लिए वर्ष 2012 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया।

धर्मेंद्र, सनी और बॉबी जब ‘यमला पगला दीवाना’ में एक साथ नजर आए तो दर्शकों ने फिल्म को ढेर सारा प्यार दिया। यही वह दौर था जब धर्मेंद्र सोशल मीडिया पर भी एक्टिव थे और अपने फार्महाउस के वीडियो दर्शकों के साथ शेयर करते रहे। इन वीडियो से दर्शकों को पता चलता था कि हिन्दी सिनेमा का यह बड़ा स्टार, निजी जीवन में बहुत सादा और गँवई है।

धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ 25 दिसंबर को रिलीज होगी। आज उनके जाने से गमगीन सिने प्रेमी इस फिल्म के माध्यम से उन्हें आखिरी बार बड़े पर्दे पर देख सकेंगे।