गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण के फैसले के खिलाफ शुक्रवार (25 जनवरी, 2019) को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दी गई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली बेंच ने केंद्र को इस बाबत एक नोटिस भेजा है। कोर्ट ने इसी के साथ नौकरी और शिक्षा में सामान्य वर्ग के गरीब तबके को 10 फीसदी आरक्षण देने पर तत्काल रोक लगाने से साफ इन्कार कर दिया।
न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, सीजेआई और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने कहा, “हम मामले की जांच करेंगे।” बेंच ने इस मसले पर केंद्र को अपना जवाब देने के लिए कुल चार हफ्तों की मोहलत दी है।
बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार ने शिक्षा और नौकरी में गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लिया था। 10 जनवरी को इसी संबंध में यूथ फॉर इक्वैलिटी संगठन और जनहित अभियान की तरफ से पीआईएल दाखिल की गई थी।
याचिका के जरिए आरक्षण बिल पर रोक की मांग की गई थी, जिसे उससे कुछ समय पहले संसद से पास कराया गया था। दावा किया गया कि इस बिल ने संविधान की मूल विशेषताओं का उल्लंघन किया, क्योंकि आर्थिक आधार पर सामान्य श्रेणियों तक आरक्षण सीमित नहीं किया जा सकता और
इसका आंकड़े 50 फीसदी से पार नहीं जा सकता है।
याचिका में आगे कहा गया कि इस विधेयक के आने के बाद पहले से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को दिए जा रहे आरक्षण से अधिक होगा। संगठन के हवाले से कुछ दूसरी रिपोर्ट्स में कहा गया कि आरक्षण अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए। संस्था के अनुसार, “अच्छी पढ़ाई, स्कॉलरशिप, आर्थिक मदद और हॉस्टल आदि को बढ़ाया जाना चाहिए, जबकि आरक्षण को कम किया जाना चाहिए।”
उधर, तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) और द्रविड़र कड़गम सरीखी राजनीतिक पार्टियों ने भी इस विधेयक के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मद्रास हाईकोर्ट ने 21 जनवरी को डीएमके की याचिका के आधार पर केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी किया था।
