अभी तक राजनीतिक दलों पर पाबंदी और नेताओं के नजरबंदी में होने की वजह से वहां राजनीतिक गतिविधियां लगभग रुकी हुई थीं। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को समाप्त हुए करीब सवा साल हो गए। हालांकि इस बीच वहां पंचायत के चुनाव हुए, पर उसमें सभी राजनीतिक दलों ने हिस्सा नहीं लिया था। स्थानीय लोगों में भी ज्यादातर विरोध का ही रुख दिखाई दिया था।

मगर इस चुनाव में उत्साहजनक शिरकत नजर आई। केंद्र सरकार चाहती थी कि घाटी में जल्दी लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हो और विकास कार्यों को गति मिल सके। स्थानीय निकायों के चुनाव इस मायने में महत्त्वपूर्ण हैं कि उनके माध्यम से ही केंद्र की अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन होता है। यानी अब रुकी हुई योजनाएं गति पा सकेंगी और नई योजनाओं के लिए रास्ता खुलेगा। यह चुनाव इस बात का भी संकेत है कि घाटी के लोग अब सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार कर चुके हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों की ताकत तभी बनती है, जब वे चुनाव के जरिए पक्ष या विपक्ष में रहते हैं। मगर घाटी में अलगाववादी ताकतें लंबे समय से लोकतांत्रिक व्यवस्था को मानने से इनकार और चुनावों का बहिष्कार करती रही हैं।

हलांकि वहां के राजनीतिक दल चुनाव के जरिए अपनी हैसियत हासिल करने का प्रयास करते रहे हैं, पर पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस का ध्यान मुख्य रूप से घाटी पर ही केंद्रित रहा है। इस चुनाव में जम्मू-कश्मीर के सभी क्षेत्रीय दलों और कुछ भाजपा विरोधी दलों ने मिल कर एक गठबंधन बनाया था। गुपकर गठबंधन।

इन दलों ने दावा किया था कि वे एकजुट होकर जनादेश हासिल करेंगे और केंद्र सरकार के फैसलों को पलटने में कामयाब होंगे। मगर डीडीसी चुनाव नतीजे इस गठबंधन के लिए उत्साहजनक नहीं कहे जा सकते। इनसे घाटी के मिजाज का पता चलता है। चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और गुपकर गठबंधन के बीच ही देखा गया।

कांग्रेस तीसरे स्थान पर नजर आई। इसमें निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी अच्छी-खासी कामयाबी हासिल की है। गठबंधन दलों के लिए यह कम बड़ी चेतावनी नहीं है कि घाटी के उनके गढ़ में घुस कर भाजपा ने अपना परचम लहराया है। यानी वहां के लोगों ने गुपकर गठबंधन दलों की तरफ से फैलाए जा रहे भ्रमों पर कान नहीं दिया और विकास की उम्मीद के पक्ष में मतदान किया।

घाटी में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद स्थानीय दल लोगों को यह समझाने में जुटे थे कि केंद्र की भाजपा सरकार उनके प्रति दुराग्रह रख कर काम कर रही है। मगर डीडीसी चुनाव नतीजों ने यह साबित किया है कि लोगों को केंद्र पर भरोसा है।

दूसरे राज्यों की अपेक्षा जम्मू-कश्मीर की स्थिति भिन्न है। वहां मुख्यधारा राजनीति से अलग ही धारा प्रभावी रहती आई है। इस लिहाज से घाटी में पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस की अगुआई वाले गुपकर गठबंधन के बजाय भाजपा, कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों पर लोगों का भरोसा अधिक दिखा है, तो यह इस बात का संकेत है कि लोग मुख्यधारा के साथ रहना चाहते हैं।

विकास कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है। इस लिहाज से घाटी से बेहतरी के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। इससे विधानसभा चुनाव का रास्ता भी साफ हुआ है।