हीरामन द्वारा तैयार कोरवा भाषा के इस शब्दकोश की खास बात है कि दैनिक जीवन में उपयोग किए जाने वाले कई शब्दों को इसमें शामिल किया है। कोरवा भाषा को संरक्षित और समृद्ध करने के उद्देश्य से हीरामन ने इस शब्दकोश को तैयार किया है। प्रधानमंत्री ने हीरामन की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह देश के लिए एक अच्छा उदाहरण है। हीरामन ने कोरवा जनजाति के लिए जो कार्य किया, वह प्रशंसनीय है। हीरामन कोरवा ने आदिम जनजाति कोरवा भाषा को पुनर्जीवित करने और उसके संरक्षण के उद्देश्य से कोरवा भाषा का शब्दकोश तैयार किया है।
हीरामन ने 12 साल में शब्दकोश को तैयार किया है। 50 पन्नों के इस शब्दकोश में घर-गृहस्थी से जुड़े शब्द से लेकर, अनाज, सब्जी, फल, पशु-पक्षी, रंग, दिन, महीना, खाद्य पदार्थ सहित अन्य कोरवा भाषा के शब्द और उसके अर्थ को शामिल किया गया है। पेशे से पैरा शिक्षक हीरामन कोरवा को बचपन से ही कोरवा जनजाति के लिए कुछ करने की इच्छा थी।
विलुप्त हो रही कोरवा जनजाति और लोगों के बीच कोरवा भाषा को भूलने की टीस हमेशा बरकरार रही। हीरामन ने बचपन से ही कोरवा भाषा को एक जगह लिखने की कोशिश शुरू की। आर्थिक तंगी के कारण हीरामन को करीब 12 साल लग गए। आदिम जनजाति कल्याण केंद्र- गढ़वा और पलामू के मल्टी आर्ट एसोसिएशन के सहयोग से इस शब्दकोश को लोगों के बीच लाया जा सका।
देश में जनजातियों की आबादी करीब 8.2 फीसद है। झारखंड में 32 जनजातियां हैं, जिसमें नौ जनजातियां विलुप्त हो रही कोरवा सहित अन्य जनजातियों की श्रेणी में आती है। झारखंड में वर्ष 2011 की जनगणना में राज्य में कोरबा जनजाति की आबादी 35,606 गिनी गई। वर्ष 1911 में बिहार में कोरवा जनजाति की जनसंख्या 13,920 थी। वर्ष 1931 में इसकी जनसंख्या में गिरवाट आई और संख्या 13,021 पहुंच गई। लेकिन, वर्ष 1961 में इसकी जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई और संख्या 21,162 पहुंच गई।
वर्ष 1971 में इसकी जनसंख्या 18,717 पहुंच गई। वर्ष 1981 की जनगणना में कोरवा जनजाति की आबादी 21,940 थी। हीरामन कोरवा का कहना है कि भाषा वह साधन है, जिसके जरिए सभी अपने विचारों को व्यक्त कर सकते हैं। इसके लिए लोग वाचिक ध्वनियों का इस्तेमाल करते हैं और यह अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। सभी प्रमुख भाषाओं का विकास निरंतर चल रहा है।
इस दौरान कई आदिम जनजातियां अपने अस्तित्व को बचाने के संकट से ही जूझ रही हैं, ऐसे में भाषा को बचाए रखना और बड़ी चुनौती है। इन्हीं में से आॅस्ट्रो-एशियाई परिवार की एक आदिम जनजाति कोरवा भी है। यह आदिम जनजाति मुख्य रूप से झारखंड पलामू प्रमंडल के रंका, धुरकी, भंडरिया, चैनपुर, महुआटांड़ सहित अन्य प्रखंडों में निवास करती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हीरामन की लिखित कोरवा भाषा शब्दकोश इसे संरक्षित और समृद्ध करने में मील का पत्थर साबित होगी।

