राजग का हिस्सा होने के बावजूद कई महीनों से शिव सेना केंद्र सरकार के फैसलों और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की जब-तब आलोचना करती आ रही थी। यहां तक कि कई मौकों पर उसकी प्रतिक्रिया और विपक्ष के बयानों में कोई फर्क नहीं होता था। इसलिए मंगलवार को शिव सेना ने अगला लोकसभा और विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का एलान किया, तो इस पर लोगों को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। किसी हद तक हैरानी की कोई बात है, तो बस इसीलिए कि भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिव सेना ही रही है। अब भी शिव सेना ने न तो भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार से अलग होने का फैसला किया है न महाराष्ट्र सरकार से। पार्टी ने ताजा फैसला मंगलवार को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आम राय से किया। सवाल है कि शिव सेना ने अकेले चलने का फैसला किया है, तो केंद्र और राज्य, दोनों जगह मंत्रिमंडल में बने रहने का क्या औचित्य है? लेकिन शिव सेना को इस तरह के किसी नैतिक सवाल से कोई लेना-देना नहीं है। उसका फैसला रणनीतिक है। शिव सेना और भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ा था। नतीजे आए, तो भाजपा, शिव सेना के मुकाबले बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आई। 288 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के खाते में 122 सीटें आर्इं, जबकि शिव सेना को 63 सीटें ही मिल पार्इं।
शिव सेना इस स्थिति को कभी पचा नहीं पाई। ‘सामना’ में रह-रह कर आने वाली मोदी और भाजपा की आलोचना के पीछे केंद्रीय मंत्रिमंडल में संतोषजनक हिस्सेदारी न मिलने की शिव सेना की शिकायत के अलावा एक वजह यह भी है। फिर, शिव सेना जानती है कि अगर अगला चुनाव वह भाजपा के साथ मिल कर लड़ेगी, तो पिछले चुनावों के नतीजों के आधार पर, उसे कनिष्ठ सहयोगी के तौर पर ही लड़ना होगा। यह कड़वी हकीकत वह कबूल नहीं करना चाहती होगी। पिछले साल वृहन्मुंबई नगर महापालिका का चुनाव भी दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा था। इसमें भाजपा को अपूर्व कामयाबी मिली, अलबत्ता उसकी सीटें शिव सेना से थोड़ी कम आर्इं। मुंबई को शिव सेना अपना गढ़ मानती आई है। लिहाजा इस चुनाव के जरिए मुंबई में भाजपा की बढ़ी हुई ताकत को भी वह पचा नहीं पाई। लेकिन फिर हुआ यह कि सुलह-समझौैते के तौर पर फडणवीस ने मेयर पद के लिए शिव सेना को समर्थन की पेशकश की, और मेयर पद पाकर शिव सेना ने भी फिर से दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया। वृहन्मुंबई नगर महापालिका में शिव सेना को भाजपा के समर्थन की जरूरत थी, तो विधानसभा में भाजपा को शिव सेना के समर्थन की, क्योंकि भाजपा भले सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, पर वह बहुमत की शर्त यानी 144 सीटों के आंकड़े से दूर रह गई थी।
अगर शिव सेना विधानसभा में भाजपा से नाता तोड़ेगी, तो फडणवीस सरकार अल्पमत में आ सकती है। लेकिन भाजपा के समर्थन के बगैर शिव सेना भी एशिया की सबसे समृद्ध नगर पालिका कही जाने वाली वृहन्मुंबई नगर महापालिका को गंवा बैठेगी। इसलिए तमाम नोक-झोंक और तकरार के बावजूद, शिव सेना शायद सत्ता में साझेदारी का रिश्ता बनाए रखना चाहेगी। शिव सेना की खुन्नस महाराष्ट्र में भाजपा के साथ शक्ति-समीकरण बदल जाने और कनिष्ठ सहयोगी बन जाने की है। इसलिए वह अन्य राज्यों में भाजपा को नुकसान पहुंचते देखना चाहती होगी। दूसरे राज्यों में हिंदुत्व के नाम पर चुनाव लड़ने के उसके इरादे के पीछे यही कुंठा काम कर रही होगी। अगर शिव सेना अपने ताजा फैसले पर कायम रहती है, तो इसका लाभ महाराष्ट्र में कांग्रेस और राकांपा को होगा। अगर कांग्रेस और राकांपा ने मिल कर लड़ा तो उन्हें यह संभावित लाभअधिक हो सकता है। पर शिव सेना के अकेले चुनाव लड़ने के निर्णय का यह मतलब नहीं कि चुनाव के बाद वह भाजपा से हाथ नहीं मिलाएगी। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद, जैसे सुर फिर से मिल गए, उसी तरह सत्ता में हिस्सेदारी का मौका दिखने पर, अगली बार भी हो सकता है।

