नाज खान
भारत में मुसलिम महिलाओं की बड़ी आबादी आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वतंत्रता के लिहाज से सबसे पिछड़ी हुई है। यों तो इस्लाम में महिलाओं को पुरुषों के बराबरी का दर्जा देने की बात की गई है और उनको विवाह में सहमति का अधिकार सहित, पुनर्विवाह, संपत्ति में अधिकार, तलाक और खुलह लेने जैसे कई हक दिए गए हैं। इसके बावजूद तीन तलाक के नाम पर महिलाओं का शोषण आम बात है। उन्हें आर्थिक तौर पर कमजोर रखने और शिक्षा से वंचित करने के लिए हमारा समूचा पुरुषसत्तात्मक तंत्र जिम्मेदार है। इसके बावजूद न तो महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी है और न ही पुरुष समाज ने उनको यह अधिकार दे रहा है।
यह हालात तब हैं जब इस्लाम में महिलाओं को कई अधिकार न सिर्फ दिए गए हैं, बल्कि पुरुषों को यह ताकीद भी की गई है कि वह महिलाओं को उनका हक दे। हालांकि, शिक्षा और संपत्ति जैसे अधिकारों पर गरीबी और सीमित संसाधनों का तर्क पुरुष वर्ग देता रहा है मगर क्या पूरे तौर पर यही कारण महिलाओं की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है? कारणों पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि इसके पीछे संसाधनों से ज्यादा इस समाज की पुरुषवादी मानसिकता और इस्लाम की शिक्षाओं की जानकारी का न होना है। अधिकारों को न तो महिलाएं जानती हैं और जो पुरुष इससे वाकिफ भी हैं वह पुरुषवादी मानसिकता के तहत अधिकार महिलाओं को नहीं देते।
इस्लाम में शिक्षा के मामले में पुरुष और महिला में कोई भेद नहीं किया गया है और कहा गया है कि एक महिला के शिक्षित होने का अर्थ हैै, एक परिवार, कुल का शिक्षित होना। महिलाएं अशिक्षित हैं तो परिवार और कुल तो तालीम से दूर होंगे ही। मुसलिम समुदाय की स्थिति का खाका पेश करती सच्चर समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि मुसलिमों की शिक्षा दर राष्ट्रीय औसत शिक्षा दर से काफी कम है। इसमें महिलाओं की साक्षरता दर महज 53.7 फीसद ही है और ये वे महिलाएं हैं जिन्हें केवल अक्षर ज्ञान ही है।
इसमें भी रोजगार में लगी महिलाओं का आंकड़ा तो अन्य वर्गों की महिलाओं से कहीं निचले स्तर पर यानी 25.2 फीसद ही है। यही वजह है कि ज्यादातर महिलाएं आर्थिक तौर पर अपने परिवारीजन पर निर्भर रहने पर मजबूर हैं। बात फिर वही है कि जब शैक्षिक स्तर ही कमजोर हो तो फिर किसी और तरह के अधिकार की बात ही बेमानी हो जाती है। दरअसल, इस समुदाय में इस्लाम की शिक्षाओं को अपनी-अपनी सहूलियत के मुताबिक परिभाषित कर लिया गया है। इस्लाम में शिक्षा की ताकीद के बावजूद लड़कियों को तालीम नहीं दी जाती। पिता और पति की संपत्ति में उन्हें हिस्सा दिए जाने की बात इस्लाम में कही गई है लेकिन शायद ही यह अधिकार महिलाओं को मिलता हो। शादी के समय दिए जाने वाले दहेज को ही उनका हिस्सा मान लिया जाता है। तलाक के बाद महिलाओं को पति का घर छोड़ देना पड़ता है, गुजारा भत्ता भी उसे इद्दत की अवधि तक ही मिलता है। ऐसे में जब उसका आर्थिक पक्ष कमजोर होना तय है। इस ओर एक गैरसरकारी संगठन ‘भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन’ ने यह मांग उठाई है कि तलाक के बाद गुजारा भत्ता मुसलिम विमेन प्रॉटेक्शन आॅफ राइट्स आॅन डाइवोर्स एक्ट 1986 के अनुसार दिया जाए।
वहीं मेहर की न्यूनतम रकम भी लड़के की वार्षिक आय के बराबर करने और निकाह के समय ही देने की बात कही है। इस्लाम में यह व्यवस्था है कि मेहर की राशि पुरुष विवाह होते ही अपनी पत्नी को दे दे। मगर शायद ही कोई यह राशि देता हो। अक्सर यह बात उठती रही है कि मुसलिम पुरुषों को कई निकाह करने का हक है लेकिन उनकी पत्नियों को इस संबंध में कोई अधिकार प्राप्त नहीं हैं। मुसलिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939 महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार उन हालात में देता है जब पति निर्दयता का सुलूक करता हो, लंबे समय तक वह पारिवारिक जिम्मेदारियां न उठा रहा हो, पति की गैरमौजूदगी, कारावास, नपुंसकता, पागलपन, पत्नी द्वारा पति के दूसरे विवाह पर अस्वीकृति हो। मगर इन अधिकारों की महिलाओं को जानकारी नहीं है।
इसी का फायदा पुरुष उठाते रहे हैं। इसमें काजियों की भी अहम भूमिका रहती है। तमिलनाडु वक्फबोर्ड की पूर्व अध्यक्ष बदर सईद ने उच्च न्यायालय, मद्रास में एक याचिका दायर कर मांग की कि तलाक काजियों के माध्यम से न होकर अदालत के जरिए हो। इसके प्रमाण में उन्होंने काजियों द्वारा जारी बहुत से प्रमाण पत्र अदालत में पेश किए, जिनमें एकतरफा और मनमाने ढंग से तलाक को प्रमाणित किया गया है। इसकी वजह महिलाओं की अशिक्षा और अधिकारों की जानकारी न होना ही है। हालात यह है कि महिलाओं को इस्लाम से मिले अधिकारों का भी पता नहीं है। इस्लाम में सिर्फ अधिकार ही नहीं दिए गए हैं, बल्कि पुरुषों को भी महिलाओं के समान शालीनता से जीवन जीने का उपदेश दिया गया है।
मजहब को लेकर कुछ भ्रांतियां इस समाज ने खुद भी गढ़ ली हैं और इसके पीछे मजहब नहीं इस समाज की अपनी सोच जिम्मेदार है। लड़कियों की सहशिक्षा के विरोध में उनको तालीम से दूर रखा जाता है। अक्सर प्राथमिक शिक्षा के बाद लड़कियों की पढ़ाई रुकवा दी जाती है, उनकी युवावस्था और विवाह का हवाला देकर। वहीं ससुराल जाकर चूल्हा-चौका करने की बात कहकर लड़कियों की तालीम को नजरअंदाज किया जाना आम बात है। एक सच यह भी है कि उच्च शिक्षित लड़कियों के लिए योग्य वर ढ़ूंढ़ने में दिक्कतें आती हैं। इसके लिए भी काफी हद तक मुसलिम समाज खुद भी जिम्मेदार है क्योंकि लड़कों की शिक्षा भी वह इस तर्क के साथ छुड़ा देता है कि कौन सा पढ़-लिख कर नौकरी मिल जाएगी। हालांकि, एक वजह दहेज भी है। बेटी के पिता की यह सोच भी होती है कि, बेटी की शिक्षा पर धन खर्च कर दिया तो दहेज के लिए कुछ नहीं बचेगा, फिर विवाह कैसे होगा। फिर भी इसे इच्छाशक्ति का अभाव और शिक्षा के लिए उदासीनता ही कहेंगे कि कई शिक्षा कार्यक्रम के बावजूद शिक्षा का स्तर बहुत कमतर है।
भारत में मुसलिम महिलाओं की संख्या बड़ी मात्रा में है इसके बावजूद एक सांगठनिक ताकत के रूप में उभर नहीं पार्इं। यही वजह है कि महिलाओं को अपनी जिंदगी से संबंधित फैसलों में भी पुरुषों और समाज पर निर्भर रहना पड़ता है। बात निकाह की हो या तलाक की, इस्लाम में महिलाओं के लिए आसान रास्ते बनाए गए हैं। जैसे पुरुषों को तलाक का हक है तो महिलाओं को खुलह का। हालांकि इस संबंध में कम ही महिलाएं जानती हैं। इसी का फायदा पुरुष उठाते हैं और महिलाएं रिश्तों को ढोने पर मजबूर होती हैं। महिलाओं के पास भी इसके सिवाय कोई चारा नहीं होता क्योंकि एक तरफ उनके आर्थिक हालात बदतर हैं तो वहीं पुरुषवादी मानसिकता उन्हें कोई फैसला लेने नहीं देती। वहीं अपनी सहमति से विवाह करने को भी इस्लाम में मान्यता देते हुए लड़कियों को ‘सहमति का अधिकार’ दिया गया है। निकाह के वक्त ‘कुबूल है’ शब्द इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम लड़कियों को विवाह में सहमति और असहमति का हक भी देता है। ०

