हर साल गणतंत्र दिवस पर किसी न किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष को अतिथि के तौर पर बुलाया जाता रहा है। लेकिन इस बार खास बात यह है कि किसी एक देश के नहीं, बल्कि दस देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भारत के मेहमान हैं। ये देश हैं सिंगापुर, थाईलैंड, म्यांमा, ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, विएतनाम, लाओस और फिलीपीन्स। इन सभी देशों के प्रतिनिधियों को एक साथ गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्या मंशा रही होगी, यह बिलकुल साफ है। वे आसियान देशों के साथ भारत की व्यापारिक और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। और इस सिलसिले में अतिथि नेताओं के साथ बुधवार तथा गुरुवार को उनकी बातचीत हुई। उम्मीद है कि अलग-अलग द्विपक्षीय वार्ताओं का दौर इन देशों के साथ भारत के संबंधों को और मजबूती देगा। आसियान के सदस्य-देशों या दक्षिण पूर्व एशिया से संबंध बढ़ाने की ललक नई नहीं है। दरअसल, भारत की विदेश नीति और विदेश व्यापार में आसियान के करीब आने की ललक उदारीकरण का दौर शुरू होने के साथ ही तेज हुई। क्योंकि निवेश और बाजार के लिए नए-नए क्षेत्रों की तलाश थी, और इस क्रम में उस वक्त तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था कहे जाने वाले देशों की तरफ भारत का मुखातिब होना स्वाभाविक था।
उदारीकरण या बाजार-केंद्रित आर्थिक सुधारों की नींव नरसिंह राव सरकार ने डाली थी और ‘लुक ईस्ट’ यानी पूरब की ओर देखो की नीति भी उसी समय शुरू हुई। वर्ष 2017 में आसियान से भारत की साझेदारी के पच्चीस साल, शिखर-स्तरीय वार्ता के पंद्रह साल और रणनीतिक भागीदारी के पांच साल पूरे हुए। इस संदर्भ में भी आसियान नेताओं का भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के अतिथि बनना मायने रखता है। आसियान को महत्त्व देने के पीछे एक और कारण है। पाकिस्तान से तनाव के कारण सार्क को लेकर भारत की दिलचस्पी घट गई है। इसीलिए आसियान के अलावा बिम्सटेक में भी भारत ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। आसियान और बिम्सटेक, दोनों से भारत की साझेदारी बढ़ाने के क्रम में तीन ‘सी’ यानी कॉमर्स, कनेक्टिविटी और कल्चर यानी व्यापार, संपर्क और संस्कृति की बात कही जाती है। इसमें दो राय नहीं कि इन तीनों क्षेत्रों में आदान-प्रदान बढ़ने की काफी संभावनाएं हैं। पर कुछ चुनौतियां हैं और कुछ सीमाएं भी।
भारत ने पहले ही आसियान के कई देशों के साथ अलग-अलग मुक्त व्यापार समझौते कर रखे हैं। फिर, भारत का निर्यात कमजोर है और आसियान से होने वाले आयात को लेकर हमेशा एक अंदेशा यह बना रहता है कि इसका कहीं घरेलू बाजार या घरेलू उत्पादकों पर बुरा असर तो नहीं पड़ेगा। मसलन, खाद्य तेल के आयात को लेकर अकसर चिंता जताई जाती रही है। फिर भी, व्यापार से लेकर शिक्षा और पर्यटन तक, भारत और आसियान के बीच आदान-प्रदान लगातार बढ़ता ही रहा है। नालंदा विश्वविद्यालय में आसियान के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए भारत ने छात्रवृत्तियां निश्चित कर रखी हैं। आसियान में भारत की दिलचस्पी का एक आयाम कूटनीतिक और रणनीतिक भी है। दक्षिण पूर्व एशिया में किसी बड़ी ताकत का सबसे ज्यादा प्रभाव रहा है तो वह है चीन का। आसियान के देश अब भी चीन से टकराव का जोखिम मोल नहीं ले सकते, पर वे चीन से चिपके भी नहीं रहना चाहते। दक्षिण चीन सागर विवाद ने उन्हें दुनिया की दूसरी बड़ी ताकतों की तरफ भी देखने के लिए प्रेरित किया है। भारत चाहे तो इस स्थिति का लाभ उठा सकता है। जापान, भारत, आस्ट्रेलिया और अमेरिका का जो चतुष्टय बना है वह भी इसमें सहायक साबित होगा।

