मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश करते हुए आनंदी बेन पटेल ने उम्र का हवाला दिया है, पर उनका इस्तीफा गुजरात में भाजपा की चिंताओं से भी ताल्लुक रखता है। मजे की बात यह है कि इस्तीफे की पेशकश उन्होंने पार्टी की किसी बैठक या पार्टी नेताओं से किसी चर्चा के दौरान नहीं की, बल्कि सीधे फेसबुक पर लिखे एक पोस्ट में इस्तीफे का इरादा जताया। कहा कि पार्टी ने किसी पद की जिम्मेदारी के लिए अधिकतम पचहत्तर साल की उम्र-सीमा तय कर रखी है, इसलिए वे पद छोड़ना चाहती हैं। इस तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसी आधार पर नजमा हेपतुल्ला को केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा था। पार्टी में उम्र-सीमा के चलते कीमत चुकाने के कुछ और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। आनंदी बेन पटेल नवंबर में पचहत्तर साल की हो जाएंगी।

तीन महीने पहले उन्हें पद छोड़ने की जरूरत क्यों महसूस हुई? उन्होंने सफाई देने के अंदाज में कहा है कि अभी इस्तीफा देने का निर्णय उन्होंने इसलिए किया ताकि उनके उत्तराधिकारी को अगले साल जनवरी में होने वाले वाइब्रेंट गुजरात के आयोजन के लिए पर्याप्त समय मिल सके। इस तर्क को भी बेतुका नहीं कहा जा सकता। मगर मुख्यमंत्री के तौर पर अगस्त भर के उनके कार्यक्रम तय थे। इसलिए ऐसा लगता है कि इस वक्त इस्तीफा देने के पीछे कुछ दूसरी वजहें भी रही होंगी, संभव है दूसरी वजहें ही ज्यादा अहम हों। फिर, उनकी विदाई की अटकलें महीनों से लगाई जा रही थीं। ऐसा क्यों था? दरअसल, पिछले साल हुए पाटीदार आंदोलन ने पार्टी को गहरी चिंता में डाल रखा था। पार्टी के भीतर भी यह आम धारणा थी कि इस आंदोलन से निपटने में राज्य सरकार ने सूझ-बूझ नहीं दिखाई। अलबत्ता आनंदी बेन मानती थीं कि गुजरात भाजपा के भी कुछ नेताओं ने उस आंदोलन को शह दी। फिर, पंचायत चुनावों में भाजपा को शिकस्त खानी पड़ी और दो दशक बाद खासकर ग्रामीण गुजरात में कांग्रेस को अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका मिला।

इस पृष्ठभूमि में आनंदी बेन की अचानक विदाई में जो कारण निर्णायक साबित हुआ वह था पिछले महीने हुआ ऊना कांड। ऊना में कथित गोरक्षकों ने कुछ दलितों की बर्बर पिटाई करके भाजपा को सांसत में डाल दिया। ऊना कांड को लेकर गुजरात में बड़े पैमाने पर दलितों के विरोध-प्रदर्शन हुए। विरोध की गूंज बाकी देश में भी सुनाई दी है। इस सब का असर गुजरात के अलावा पंजाब और उत्तर प्रदेश में भी पड़ने की आशंका ने पार्टी को चिंता में डाल रखा है। क्या आनंदी बेन की विदाई और मुख्यमंत्री के रूप में एक नया चेहरा आ जाने से सब कुछ ठीकठाक हो जाएगा? कहना मुश्किल है। गुजरात में भाजपा महिला मोर्चा की जिम्मेदारी से अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाली आनंदी बेन 1998 में पहली बार मंत्री बनीं और तब से कोई न कोई महकमा संभालती रहीं। मई 2014 में वे मुख्यमंत्री बनीं, क्योंकि नरेंद्र मोदी के दिल्ली सत्तारोहण के चलते गुजरात की गद््दी खाली हो गई थी और वे मोदी की पसंद थीं। उनके कामकाज और फैसलों को लेकर पार्टी के भीतर जो भी असंतोष और मतभेद थे, वे मोदी का वरदहस्त होने के चलते दबे रहते थे। आनंदी बेन का उत्तराधिकारी भी वही होगा जिसे मोदी चाहेंगे। पर उसके सामने चुनौती या उससे पार्टी की अपेक्षाएं आनंदी बेन के मुकाबले कहीं ज्यादा होंगी, क्योंकि अगले साल गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए यह नेतृत्व परिवर्तन वैसा सामान्य मामला नहीं है जैसा पार्टी दिखाने की कोशिश कर रही है।