उत्तर प्रदेश की सियासत में गुरुवार को उस वक्त एक नया नजारा देखने को मिला जब समाजवादी पार्टी में हाशिए पर कर दिए गए ‘बाहुबली’ राजनीतिक मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का बसपा में विलय हो गया। मुख्तार पहले भी बसपा में रह चुके हैं। वह कई हत्याओं में नामजद अभियुक्त हैं और करीब एक दशक से जेल में विचाराधीन कैदी हैं। जेल में रह कर भी वे विधानसभा का चुनाव दो बार जीत चुके हैं। विडंबना है कि बसपा सुप्रीमो मायावती एक तरफ अपराधियों और गुंडों को कुचलने का दम भरती हैं और दूसरी तरफ अपनी पार्टी में मुख्तार अंसारी का स्वागत करते उन्हें तनिक संकोच नहीं हुआ। यही नहीं, मुख्तार एक समय बसपा में ही थे, और 2010 में मायावती ने जब उन्हें पार्टी से निकाला था, तब उन पर गुंडा-छवि का होने का ही आरोप लगाया था।
कौमी एकता दल का कोई बड़ा जनाधार न होते हुए भी पूर्वांचल के तीन-चार जिलों में अल्पसंख्यकों में इसकी थोड़ी-बहुत पकड़ मानी जाती है। इसी लोभ में मायावती ने यह दांव आजमाया है और आगामी विधानसभा चुनाव में कौमी एकता दल के कोटे में वे तीन टिकट देने को भी तैयार हो गई हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे और एक हद तक ब्राह्मण-समर्थन जुटा कर बसपा को अपने दम पर बहुमत दिलाने में कामयाब हुई थीं। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता भी नहीं खुला। ऐसा लगता है इस बार के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी रणनीति दलित-मुसलिम वोटों के जोड़ पर बनाई है। सबसे ज्यादा मुसलिम उम्मीदवार बसपा ने ही उतारे हैं। मगर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन होने पर उन्हें डर सताने लगा कि अल्पसंख्यकों का झुकाव इस गठबंधन की तरफ हो सकता है। शायद इसी की काट में उन्होंने मुख्तार अंसारी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। लेकिन मायावती के लिए यह सौदा महंगा भी साबित हो सकता है, क्योंकि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दागी छवि की वजह से ही कौमी एकता दल के विलय को स्वीकार नहीं किया था और न ही कोई टिकट देने को राजी हुए। वहां से ठुकराए जाने के बाद अंसारी-बंधुओं को कहीं न कहीं पनाह की दरकार थी। बसपा के चुनाव प्रचार का एक खास मुद््दा कानून-व्यवस्था है, जो कि ‘बहनजी को आने दो’ के उसके नारे व विज्ञापन से जाहिर है। अब बसपा के आने पर अपराधियों को सबक सिखाने का बसपा का वादा कितना विश्वसनीय हो पाएगा?
हालांकि सपा के सर्वेसर्वा होने के बावजूद अखिलेश यादव ने भी उन तमाम आरोपियों को टिकट दे दिया है, जिन्हें उन्होंने खुद भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। दूसरे दलों ने भी बिना किसी लाज-लिहाज के दागियों को टिकट दिया है। यह बेहद अफसोस की बात है कि इसलिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अब साफ-सुथरी छवि बनाम दागी छवि का मुद््दा गौण हो चुका है, या इतना प्रभावी नहीं दिखता कि आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट देते हुए किसी पार्टी को मतदाताओं की नाराजगी का डर सताए। चुनाव तो कुछ दिनों में संपन्न हो जाएंगे, पर बदलाव व लोक-हित के तमाम नारों के बावजूद क्या हम यह कह पाएंगे कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर कुछ बेहतर हुई है?
