आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग पर तेलुगु देशम पार्टी के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू ने केंद्र सरकार से अपने दोनों मंत्रियों को हटा कर एकबारगी तो सबको चौंका दिया है। बदले में चंद्रबाबू नायडू की सरकार से भी भाजपा के दो मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। दोनों ओर से दो-दो मंत्रियों ने सरकार भले छोड़ दी हो, लेकिन गठबंधन टूटने का एलान अभी किसी भी तरफ से नहीं हुआ है। गठबंधन कब तक बना रहेगा, इस बारे में अभी कोई कयास लगाना जल्दबाजी होगी। दरअसल, तेदेपा सत्ता में आने के बाद से ही आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने की मांग कर रही है। इस मांग को लेकर संसद के भीतर और बाहर जब-तब तेदेपा के धरने-प्रदर्शन होते रहे हैं। लेकिन इस बार जब बजट में आंध्र प्रदेश को कोई विशेष पैकेज नहीं मिला तो तेदेपा का धैर्य टूट गया और उसने सरकार से अलग होने का फैसला कर डाला। इसकी एक वजह चुनावी भी हो सकती है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी विधानसभा चुनाव अगले साल लोकसभा चुनाव के साथ ही होने हैं। आंध्र में चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव, दोनों की ही प्राथमिकता विधानसभा चुनाव में अपनी सत्ता बचाने और भाजपा को रोकने की है। पूर्वोत्तर में भाजपा की कामयाबी ने क्षेत्रीय दलों की नींद उड़ा दी है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से लेकर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओड़िशा तक के सत्तारूढ़ क्षेत्रीय दल अगले चुनाव में अपने को बचाने की चिंता में हैं। विशेष दर्जे की मांग को तूल देने सेनायडू को उम्मीद होगी कि इससे आंध्र की जनता में यह संदेश जाएगा कि भाजपा आंध्र प्रदेश की अनदेखी कर रही है। फिर, नायडू की निगाहें कांग्रेस की ओर भी हैं। राहुल गांधी पहले ही कह चुके हैं कि अगर उनकी पार्टी केंद्र में सत्ता में आई तो आंध्र और तेलंगाना को विशेष दर्जा देगी। चंद्रबाबू नायडू भी समझ रहे हैं कि अगले चुनाव में भाजपा वाईएसआर कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ सकती है, इसलिए इसे अभी छोड़ देना बेहतर है और साल भर में भाजपा को रोकने के लिए जमीन पुख्ता की जा सकेगी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने हाल में तीसरा मोर्चा बनाने का जो राग छेड़ा है वह भी राज्य में भाजपा को रोकने की दिशा में ही कदम है।
राजग के एक और सहयोगी जनता दल (एकी) के राज्यसभा सांसद पवन वर्मा और प्रवक्ता केसी त्यागी ने भी बिहार को विशेष दर्जा देने की मांग उठाई है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि क्या इसमें नीतीश की भी सहमति है? नीतीश यह मांग पहले कई बार उठा चुके हैं, इसलिए कहा नहीं जा सकता कि कब उनकी तरफ से बिहार के विशेष दर्जे की मांग भाजपा का सिरदर्द बन जाए। बहरहाल, केंद्र का कहना है कि चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद विशेष राज्य की श्रेणी ही खत्म कर दी गई है। ऐसे में किसी को विशेष दर्जा देना संभव नहीं है। हालत यह है कि आंध्र और तेलंगाना में रोजगार और किसानों के मुद्दे तो गरम हैं ही, विकास परियोजनाएं भी केंद्रीय मदद के बगैर सिरे नहीं चढ़ पा रहीं। इसलिए क्षेत्रीय दल चुनाव करीब आते ही अपनी रणनीति में कोई कसर नहीं रखना चाहते।
