सरकार शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण पहल करने जा रही है। केंद्र का इरादा नर्सरी से बारहवीं तक की शिक्षा को एकीकृत स्वरूप देने का है। मौजूदा तस्वीर यह है कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का संचालन अलग-अलग होता है। प्राथमिक शिक्षा का संचालन सर्व शिक्षा अभियान के तहत होता है और यह शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत आता है। जबकि माध्यमिक शिक्षा का संचालन राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत हो रहा है। नर्सरी इसमें कहीं भी शामिल नहीं है। प्रस्तावित बदलाव में सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और मिड-डे मील जैसी योजनाओं का बजट एक हो जाएगा। अभी तो इनके लिए अलग-अलग आबंटन होता है, जैसा कि इस बार के बजट में भी हुआ।
एकीकृत स्वरूप में नर्सरी को भी शामिल किया जाना चाहिए। शिक्षा अधिकार अधिनियम छह से चौदह साल के बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की बात कहता है। एकीकृत स्वरूप में छह साल से छोटे बच्चों यानी प्री-स्कूल वाले बच्चों की भी जिम्मेदारी राज्य की होनी चाहिए। निजी स्कूलों में नर्सरी के बच्चों को सीखने की जो सुविधाएं और अवसर मिलते हैं, सरकारी स्कूलों में भी क्यों न मिलें? ये सुविधाएं और अवसर न मिलने से निजी स्कूलों और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बीच शुरू में ही एक फर्क आ जाता है। ऐसे में, आगे चल कर प्रतिस्पर्धा में सरकारी स्कूलों के बच्चों को नुकसान उठाना पड़ता है।
तमाम शिक्षाविद यह कहते रहे हैं कि प्रीस्कूल का पढ़ाना-सिखाना बहुत मूल्यवान है और यही बुनियाद है। जब शिक्षा अधिकार अधिनियम में छह साल से छोटे बच्चों के बारे में कुछ नहीं कहा गया, तो इस पर काफी सवाल उठे थे। अधिनियम में इस खामोशी का राज क्या था? क्या संसाधन की कमी वजह थी? जो हो, प्रस्तावित बदलाव के तहत यह कमी दूर की जानी चाहिए। सरकार का इरादा अगले सत्र से ही यानी अप्रैल से ही प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा को एकीकृत स्वरूप देने का है और इसके लिए एक कानून का मसविदा लाया जाएगा। पर अभी तक संबंधित विधेयक केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने भी नहीं आ पाया है। लिहाजा, योजना के पूरे खाके के बारे में अभी तो बस अनुमान लगाया जा सकता है।
विधेयक आने पर ही साफ हो सकेगा कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को किस तरह संचालित किया जाएगा या उसका प्रशासनिक ढांचा किस प्रकार का होगा। संबंधित मौजूदा शिक्षा बोर्डों का क्या होगा। बहरहाल, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता की है। सरकारी स्कूलों में इन कक्षाओं में पढ़ाई-लिखाई का क्या स्तर है इसका अंदाजा गैरसरकारी संगठन ‘प्रथम’ की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। ‘शिक्षा की वार्षिक स्थिति’ नाम से हाल में आई यह रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई की स्थिति बहुत शोचनीय है, अधिकांश बच्चे अपने से निचली कक्षाओं में भी बैठने लायक नहीं हैं। सवाल है कि एकीकृत स्वरूप की पहल पढ़ाई-लिखाई का स्तर सुधारने में कितनी मददगार साबित होगी!

