पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की जड़ें बहुत गहरी और पुरानी हैं। किसी भी सत्ताधारी दल ने इसे खत्म करने का प्रयास नहीं किया। उसी का नतीजा है वहां की ताजा घटना। बीरभूम जिले के रामपुरहाट में दो दिन पहले तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की हत्या कर दी गई। उससे उस इलाके में तनाव बढ़ गया और उसकी प्रतिक्रिया में अगले रोज कुछ घरों को बाहर से बंद करके आग लगा दी गई, जिसमें दस लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है।
स्वाभाविक ही इस घटना को लेकर लोगों में रोष है और भाजपा कार्यकर्ता खासे आक्रोशित हैं। उन्होंने वहां विरोध प्रदर्शन किया, तो भाजपा सांसदों ने संसद परिसर में जुलूस निकाला। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने इस घटना की कड़ी निंदा की और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने इसे लेकर एक समिति गठित कर दी है। वहां के उच्च न्यायालय ने पुलिस से आज स्थिति रिपोर्ट सौंपने को कहा है। मगर विचित्र है कि ऐसी वीभत्स घटना के बाद भी वहां की मुख्यमंत्री दूसरे राज्यों में होने वाली ऐसी घटनाओं की नजीर देकर इस पर पर्दा डालने की कोशिश करती नजर आर्इं। इससे एक बार फिर स्पष्ट हुआ है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले सरकारी संरक्षण में अभय महसूस करते हैं।
दरअसल, यह घटना चुनाव के समय और उसके बाद हुई हिंसक घटनाओं की एक कड़ी है। वहां पिछले विधानसभा चुनावों के बाद भी बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी थी और उसमें सोलह लोग मारे गए थे। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि उसी की प्रतिक्रिया में बम फेंक कर रामपुरहाट में तृणमूल के उपप्रधान की हत्या कर दी गई और फिर उसकी प्रतिक्रिया में दस लोगों की जान ले ली गई। जिस तरह मुख्यमंत्री ने इस घटना को ढंकने-तोपने का प्रयास किया है, उससे कहना न होगा कि यह सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है।
यों तो ममता बनर्जी दूसरे राज्यों की कानून-व्यवस्था को लेकर काफी कड़वे बयान देती रहती हैं, मगर अपने ही राज्य में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल साबित होती रही हैं। क्या वहां की पुलिस को इस बात की आशंका नहीं थी कि तृणमूल नेता की हत्या के बाद प्रतिक्रिया में हिंसा हो सकती है? जब लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, तब भी उसे इसका इमकान क्यों नहीं हुआ? फिर वह क्यों चुप्पी साधे रही और बड़ी घटना का इंतजार करती रही? इसका जवाब भी ममता बनर्जी के ताजा बयान में छिपा है।
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की यह कोई नई घटना नहीं है। मगर हकीकत यही है कि खुद ममता बनर्जी ने इसे रोकने का कभी गंभीर प्रयास नहीं किया। यहां तक कि वे कई बार अपने किसी कार्यकर्ता की गिरफ्तारी पर थाने में जाकर पुलिस महकमे पर बरसती देखी गई हैं। जब वे खुद अपने कार्यकर्ताओं के अपराध पर निष्पक्ष और कड़ी कार्रवाई को रोकने के लिए इस तरह उपस्थित होंगी, तो जाहिर है कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और वे अगली बार बड़ा अपराध करने से भी नहीं डरेंगे। यही आरोप पहले माकपा पर लगा करता था कि वह गुंडा तत्त्वों को संरक्षण देती है, अब ममता बनर्जी ने भी वही तरीका अपना रखा है। इस तरह पार्टी की निजी सेना के तौर पर गुंडों को संरक्षण देकर वे अपने जनाधार की रक्षा करने का बेशक प्रयास कर लें, पर इससे राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी ही।
