कश्मीर में लगातार हिंसा और अराजकता की स्थिति ने केंद्र और राज्य सरकार, दोनों को सांसत में डाल रखा है। हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने के बाद चार दिनों से लगातार हिंसक प्रदर्शन जारी हैं। यह भी कहा जा सकता है कि ये प्रदर्शन पुलिस और अर्धसैनिक बलों के साथ लोगों के सीधे टकराव में बदल गए हैं। सरकारी प्रतिष्ठान खासकर पुलिस स्टेशन भीड़ के निशाने पर हैं। नतीजतन, हिंसा की भेंट चढ़ने वालों की तादाद चौबीस तक पहुंच गई है। सैकड़ों लोग जख्मी हुए हैं। सौ से ज्यादा सुरक्षाकर्मी भी घायल हैं। उग्र विरोध प्रदर्शनों का इतना व्यापक सिलसिला इससे पहले 2010 की गरमियों में चला था, जब सौ से ज्यादा लोगों की जान गई थी। सवाल है कि क्या हालात को इस हद तक बिगड़ने से रोका नहीं जा सकता था?

घाटी में अधिकांश जगहों पर कर्फ्यू के बावजूद स्थिति के लगातार नियंत्रण से बाहर बने रहने से केंद्र की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। लिहाजा, मंगलवार को प्रधानमंत्री ने उच्चस्तरीय बैठक बुलाई और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी बात की, वहीं जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अमन कायम करने में हुर्रियत नेताओं से भी सहयोग की अपील की। यह सारी पहल सराहनीय है। पर केंद्र और राज्य सरकार, दोनों की तरफ से गंभीर चूकें हुई हैं। वे हालात को ठीक से संभालने की तत्परता नहीं दिखा सके। वानी के मारे जाने को सुरक्षा बलों ने अपनी एक बहुत बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया। लेकिन वानी के जनाजे में हजारों लोगों की शिरकत ने बता दिया था कि कुछ अप्रत्याशित हो सकता है। उससे निपटने में खुफिया तौर पर और एहतियाती सुरक्षा उपायों के तौर पर कोताही रही होगी। फिर, हालात को अति नाजुक बनाने में कार्रवाई में रही अपरिपक्वता ने भी योगदान किया।

2010 में हुई हिंसा को लेकर खूब बहस हुई थी। तब सुरक्षा निजाम ने भी माना था कि भीड़ पर काबू पाने के लिए ऐसे तरीके अपनाए जाने चाहिए जो कम घातक हों। लेकिन लगता है 2010 के उस सबक को भुला दिया गया। यह सही है कि जब पुलिस या सुरक्षा बलों का सामना हिंसा पर उतारू भीड़ से होता है, तो जवानों व अफसरों के लिए संयम से काम लेना आसान नहीं होता। पर ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी, जब सख्त कार्रवाई की जरूरत होती है, यह ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए कि कार्रवाई आनुपातिक भी हो।

यह एक मानवीय तकाजा तो है ही, राजनीतिक व रणनीतिक रूप से भी जरूरी है, क्योंकि सैनिक या पुलिस कार्रवाई में जितनी ही जन-हानि होती है, सरकार के खिलाफ लोगों का आक्रोश उतना ही फैलता जाता है और फिर उससे निपटने के क्रम में विरोध तथा कार्रवाई का एक दुश्चक्र बन जाता है। जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी के गठबंधन की सरकार से यह उम्मीद लगाई गई थी कि वह जम्मू और घाटी के बीच की मानसिक खाई को पाटेगी तथा कश्मीर समस्या के राजनीतिक हल की दिशा में कोई ठोस पहल करेगी। ‘गठबंधन के एजेंडे’ में सभी आंतरिक पक्षों से संवाद करने का भरोसा भी दिलाया गया था। पर अपने इस घोषित वादे की दिशा में गठबंधन ने अब तक कुछ नहीं किया है। भाजपा और पीडीपी की फिक्र, बस अपने-अपने परंपरागत आधार को बनाए रखने पर केंद्रित रही है। अब उनके सामने पहले से ज्यादा कठिन चुनौती है।