अशोक गुप्ता

नीचे माताएं वीडियो देख रहीं थीं और पिता अपने मेडिकल या लीगल कंसल्टेंट्स से बात कर रहे थे। सब अकेले, अपनी-अपनी जगह व्यस्त थे, इस बात से बेखबर कि ऊपर उनके बच्चे एक तिलस्म की कैद से छूट कर आजादी का जश्न माना रहे हैं। 

सुबह अखबार आते, तो उनमें रंग-बिरंगे, छोटे-बड़े पैंफलेट्स निकलते और बच्चे उन्हें लूटने के लिए झपट पड़ते।
‘इन्हें काट कर हम रुपए बनाएंगे और खूब खेलेंगे।’ खुशी मानो उनके भीतर से फूट-सी पड़ती।
अखबारों को तो रोज आना था और रंग-बिरंगे पैंफलेट्स के बगैर अखबार आते भी तो कैसे? सो, सिलसिला चलता रहा। बच्चे लूट कर किलकते, खुश होते और बड़े होते रहे। समय बीतता गया। अब उनके यों किलकने-खेलने पर अंकुश लगने लगा, ‘चलो, पढ़ाई करो… इन कागजों के नकली रुपयों से खुश होने का क्या फायदा? पढ़ो, बड़े हो और फिर सचमुच के रुपए कमाओ। फिर देखो असली खुशी।’
बच्चे बड़ों की बात समझ गए। वे झट से दूध पीकर बड़े होने, पढ़ने-लिखने और सयाने होने में लग गए। लेकिन पैंफलेट्स की रंग-बिरंगी दुनिया उन्हें अब भी बहुत भाती। अब वे उन पैंफलेट्स को काट कर रुपए बनाने और उनसे खेलने के लिए बड़े हो चुके थे, लेकिन उन्हें पढ़ कर समझने के लिए अभी छोटे थे। सो, वे उन पैंफलेट्स को अखबारों से गिरने के बाद और फेंके जाने के पहले समेट लेते और संभाल कर रखते और इससे खुश होते, मानो वे कोई कांरू का खजाना जुटा रहे हों।
पढ़ते, पास होते, दूध पीते, बर्थ-डे मनाते वीडियो देखते और छिप-छिप कर पापा, चाचा और दादाजी की कारोबारी बैठकों और पार्टियों में ताक-झांक करते बच्चे अब इतने बड़े हो गए कि इन पैंफलेट्स को पढ़ कर समझ सकें। वे जान गए कि इनमें व्यावसायिक विज्ञापन होते हैं। सो, वे आपस में बैठ कर पैंफलेट्स को हाथों में लिए उन कारोबारों की बात करते, जिनका जिक्र उन पैंफलेट्स में होता।
उन्हें हर कारोबार को शुरू करने में फायदे की भरपूर गुंजाइश नजर आती। इन्हें लगने लगा कि सचमुच इन पैंफलेट्स से असली रुपए कमाए जा सकते हैं। वे पुलक उठते। उनकी रंग-बिरंगी तरंग में डूब कर खुद भी इंद्रधनुषी हो जाते। उनके बड़े उन्हें ठीक रास्ते पर देख कर खुश तो होते, लेकिन हिदायत भी देते, ‘अभी नहीं… अभी तो तुम सबको बहुत-बहुत आगे तक पढ़ना है… स्कूल कॉलेज और अमेरिका तक… फिर तो खुशियां ही खुशियां और रुपए ही रुपए, बल्कि कहो डॉलर ही डॉलर।’
बच्चे समझ जाते। ‘डॉलर’ सुन कर और आनंदित हो जाते। लेकिन उनका पैंफलेट्स के प्रति मोह नहीं टूटता। पैंफलेट्स आने पर वे उन्हें उठाते, सहेजते, उन्हें पढ़ते, कहीं-कहीं बड़ों की तरह हाईलाइटर पेन से निशान लगाते और उन्हें एक जगह संभल कर रख लेते। उन्हें ऐसा करने में दौलत जुटाने जैसा अहसास होता, अपने बड़ों की तरह। दौलत… और दौलत से खुशियां। उन्हें पूरा भरोसा होता कि उनकी नजर ठीक समीकरण पर पड़ी है, और वे जुट जाते कि कहीं नजर चूक न जाए।
दिन-ब-दिन अखबार आते गए। कुछ एक बरसों में बच्चों के पास और भी ज्यादा पैंफलेट्स इकठ्ठा हो गए। उन्होंने कुछ और रंगीन रास्ते अपनी जानकारी में रख लिए, जिन पर चल कर लक्ष्मी को उन तक आना था। वे तो बाहें फैलाए तैयार खड़े ही थे।
फिर एक दिन एक अजीब-सा पैंफलेट्स उनके हाथ लगा।
‘आंखों का बैंक, जिगर और गुर्दे का बैंक, प्लास्टिक सर्जरी…’
सचमुच अजीब-सा पैंफलेट था वह… जादू के चिराग जैसा तिलस्मी और उसका दावा कि इंसान के जिस्म का ऐसा कोई भी पुर्जा नहीं, जो बदला न जा सके। सुधारने के लिए काट-पीट करना गए जमाने की कीमियागिरी है, अब तो पुराना निकाल फेंको और नया लगवा लो। एकदम फिट, जिसे लगाने के बाद शरीर कहे कि बस यही तो चाहिए था। नया अंग खोजने के लिए कहीं भागने-दौड़ने की भी जरूरत नहीं। वह खजाना भी इन्हीं के पास है। जरूरतमंद को तो बस मन बनाने की जरूरत है, पैसे का क्या है, हाथ का मैल है…। उस पैंफलेट की पंच लाइन थी- ‘नया होकर जीना अब नामुमकिन नहीं रहा…’
ऐसे में पैंफलेट देखने वाले को हैरानी न हो तो क्या हो?
कमाल की बात कि उन सबको अलग-अलग, बस इसी पैंफलेट ने सबसे ज्यादा थ्रिल किया। और उसी पर बहस शुरू हो गई। बेहद उत्साहित थे सब के सब।
‘हाइली प्रोफिटेबल… भरपूर कमाई देने वाला धंधा। कभी न चुकने वाला बाजार… जिंदा तो सभी रहना चाहते हैं, और बिना सेहत के जिंदा रहने का मजा क्या है?’
उनके हाथों मानो साक्षात धनवंतरी और कुबेर एक साथ लग गए। सब बच्चों के भीतर अपनी-अपनी योजनाओं के तूफान अपने-अपने तर्कों के सहारे उठ रहे थे। किसी एक की कल्पना से बात उठती और उसके कारोबारी ज्ञान से जुड़ कर सुनहरी हो जाती। सपने, जो अब सपना भर नहीं थे उनके लिए, साक्षात सामने अवतरित हो रही कारोबारी चर्चा का अभीष्ट थे। अपनी बात, उनकी और इस-उस की बात में एक पूरा संसार था उनके सामने…। और इसी दौर में बात का विषय पता नहीं कैसे उनके घरों में पहुंच गया।
‘पापा की आंखें भी उनका साथ छोड़ने लगी हैं। अभी पिछले साल दो चश्मे बदलवाए उन्होंने। देर रात तक इन-उन फाइलों में आंखें धंसाए रहना, उनका यही सिलसिला हो गया है।… मम्मी का भी उनसे कुछ कहना-सुनना छोड़े हुए जमाना बीत गया। मम्मी तो अब बस वीडियो टीवी में उलझी रहती हैं, इसलिए उन्हें भी दूसरा चश्मा लगवाना पड़ा पिछले महीने…’
बात के असर से उनके बीच एक सन्नाटा-सा पसर आया। एक तूफान भरा सन्नाटा, जिसमें सबके भीतर ठहरे, किसी गुमशुदा से दुख को जगाना शुरू कर दिया।
एक और आवाज उभरी- ‘मेरे पापा ने तो पी पी कर अपना लीवर ही खराब कर डाला है। महीने में बीस-बीस दिन बिजनेस टूर पर रहना और होटल का खाना। ब्लड प्रेशर भी रहता है उन्हें, लेकिन कहते हैं क्या करें? इसके बगैर धंधा थोड़े चल पाएगा… घर पर होते हैं तब भी न तो लैपटॉप छूटता है, न मोबाइल… चाहे इतवार हो या त्योहार। कोई फर्क नहीं पड़ता।’
बात को बीच में काटते हुए दूसरे ने कहना शुरू कर दिया- ‘… इसीलिए मेरे दोस्त की मम्मी ने भी कंप्यूटर इंस्टीट्यूट शुरू किया है। पापा तो उसके गल्फ में हैं। बड़ा बिजनेस है उनका। सो, आंटी खाली करें तो क्या करें? देखो, पीती वह भी खूब हैं। मेरी मम्मी बताती हैं कि हर पार्टी में उनका जुलूस…’
बच्चों के इस गोल में बैठे एक सयाने बच्चे ने एक रहस्य जैसा खोला- ‘… वो तो कोई और चक्कर है यार… अंकल को शक है कि आंटी का… लेकिन वह इतना बड़ा कारोबार छोड़ कर आ भी तो नहीं सकते। कितना पैसा फैला हुआ है… अंकल का यहां का काम उनकी एक सेक्रेटरी देखती है। उसने बताया है मेरी मम्मी को, अंकल का लौटना अब मुश्किल ही है।…’
‘तो क्या हुआ…’ बात में सहसा उत्तेजना आ गई।
‘इसलिए तो क्या दोनों लोग सिर्फ एक-दूसरे से नफरत करते हुए दूर-दूर बने रहेंगे?… केवल इसलिए कि इतना पैसा फैला हुआ है। यह तो कोई बात नहीं हुई।’
‘बात का होना जरूरी होता है क्या?’ उन लोगों की, एक अजीब-से पैंफलेट से शुरू हुई बात इस बिंदु पर आ गई।
‘बात तो यह भी कुछ नहीं हुई दोस्त कि पहले बैंक में रुपया भरने के चक्कर में आंखें खराब कर डालो, लीवर फूंक डालो, चेहरे को समय से पहले झुर्रियों से भर लो, सारे रिश्तों के बीच एक ठहरी हुई-सी नफरत को बर्फ की तरह जम जाने दो, और फिर आखों के लिए, लीवर के लिए, गुर्दे के लिए, प्लास्टिक सर्जरी के लिए और धोखे भरे सुकून के लिए बैंक खाली करने लगो। …यह नया पैंफलेट तो यही रास्ता दिखा रहा है… शिट, जस्ट नॉनसेंस।’
एकाएक किसी दूसरे के मुंह से भी निकल पड़ा- ‘वाट अ बैड इकोनोमिक्स… एक सड़ा-सा अर्थशास्त्र… हुंह। पैसा भी गया, सुख-चैन और खुशी भी गई…।’
उन सबके हाथ से वह पैंफलेट छूट कर गिर गया। हर एक के भीतर बहुत कुछ था, जो बाहर आना चाहता था, लेकिन सब एक चकरघिन्नी बन कर रह गया और वे सारे बच्चे अवाक हो गए। एक कठिन मन:स्थिति में घिर आए सब बच्चे। उनकी सोच ठहर गई जैसे। जो रोमांच उन्होंने अपनी मुट्ठी में वह पैंफलेट पाकर संजोया था, वह सूखी रेत की तरह सरक कर बहने लगा, तो उन सबने अपनी मुट्ठी ढीली कर दी और अपनी हथेलियां फैला कर नीचे झुका दीं। अपनी-अपनी जगह सबके सब फ्रिज हो गए जैसे।
अचानक सब एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए और फिर उनकी मुस्कान एक खिलखिलाहट में बदल गई। वैसी ही खिलखिलाहट, जैसी पैंफलेट काट कर रुपए बनाने के दिनों में हुआ करती थी। वे सब एक साथ उठे और एक साथ उस कमरे की ओर चल पड़े, जहां उन्होंने बरसों से रंगीन पैंफलेट जमा कर रखे थे। सबके हाथों में रंग-बिरंगे कागज थे और वे उन्हें पकड़े उछलते-कूदते, पुलक भरते छत की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने सारे पैंफलेट्स ऊपर उछाल कर छत पर बेतरतीब बिखेर दिए। एक ने उन्हें मोड़ कर कागज का ग्लाइडर बनाने की कोशिश की, तो छत पर जहाज ही जहाज उड़ने लगे। कोई अपना जहाज हवा में फेंकता, तो सारे उस जहाज को लूटने उसके पीछे झपटते। किलकते-कूदते वे उन कागजी खिलौनों के पीछे ऐसे लपकते जैसे बच्चे गली में कटी पतंग लूटने के लिए भागते हैं।
उन पैंफलेट्स से नावें बनीं। आंख-नाक की जगह छेद कर के मुखौटे बनाए गए, और पता नहीं किस-किस ढंग से मिल-जुल कर वे एक ‘बैड इकोनोमिक्स’ की ऐसी-तैसी करते हुए खुशियां मानते रहे। ऐसी खुशियां, जिनके लिए आदमी कभी ओवर एज नहीं होता, लेकिन ऐसे ढंग से, जिसके लिए वे शायद बड़े हो चुके थे। नीचे माताएं वीडियो देख रहीं थीं और पिता अपने मेडिकल या लीगल कंसल्टेंट्स से बात कर रहे थे। सब अकेले, अपनी-अपनी जगह व्यस्त थे, इस बात से बेखबर कि ऊपर उनके बच्चे एक तिलस्म की कैद से छूट कर आजादी का जश्न माना रहे हैं। ०