एनपीए की चर्चा के बरक्स देश में अब तक के सबसे बड़े बैकिंग घोटाले की खबर गंभीर चिंता का विषय है। ग्यारह हजार तीन सौ करोड़ रुपए से ज्यादा की धोखाधड़ी पंजाब नेशनल बैंक की मुंबई की एक शाखा से हुई। तात्कालिक प्रतिक्रिया में पीएनबी के शेयर करीब दस फीसद गिर गए। कई दूसरे सरकारी बैंकों के शेयरों की कीमतों में भी गिरावट आई। पर यह फौरन सतह पर दिखने वाला नुकसान है। सबसे बड़ा नुकसान तो बैंकिंग क्षेत्र और खासकर सरकारी बैंकों की साख को पहुंचा है। हर किसी के मन में पहला सवाल यही आएगा कि जब दो-चार लाख का भी कर्ज देने में सरकारी बैंक फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं, तो करीब 114 अरब रुपए का घोटाला कैसे हो गया? घोटाले का खुलासा खुद पंजाब नेशनल बैंक ने किया। खुलासे के मुताबिक, हीरा कारोबारी नीरव मोदी, उनकी पत्नी, भाई और एक रिश्तेदार ने पीएनबी की ब्राडी हाउस शाखा से धोखाधड़ी करके एलओयू यानी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग लिये और विदेशों में निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से उन्हें भुनाया। एलओयू एक प्रकार का गारंटी-पत्र है जिसे एक बैंक अन्य बैंकों को जारी करता है।
एलओयू के आधार पर देश से बाहर स्थित शाखाएं पैसा देती हैं। इस दिए हुए पैसे को चुकाने की जवाबदेही या गारंटी एलओयू जारी करने वाले बैंक की होती है। खुलासे के साथ ही पीएनबी ने अपने दस कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है और सीबीआइ के पास मामले की शिकायत दर्ज कराई है। प्रवर्तन निदेशालय ने भी शिकायत दर्ज कर ली है और जांच में जुट गया है। इससे पहले पांच फरवरी को भी पीएनबी ने नीरव मोदी सहित चारों आरोपियों के खिलाफ 280 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया था। नीरव मोदी की गिनती भारत के पचास सबसे धनी व्यक्तियों में होती है। फोर्ब्स पत्रिका ने 2016 में उन्हें अरबपतियों की सूची में भारत में 46वें और दुनिया में 1067वें स्थान पर बताया था। पर अब यह साफ हो गया है कि उनकी इस उपलब्धि और शोहरत के पीछे धोखाधड़ी और लूट का बहुत बड़ा हाथ रहा होगा। क्या इस तरह का तरीका अपनाने वाले नीरव मोदी अपवाद हैं? यह घोटाला ऐसे वक्त सामने आया है जब एक ही रोज पहले रिजर्व बैंक ने एनपीए की बाबत और सख्ती दिखाते हुए सरकारी बैंकों को निर्देश जारी किया कि वे फंसे हुए कर्ज के मामले एक मार्च से छह माह के भीतर सुलझा लें। बिना अदायगी वाले पांच करोड़ रुपए से ज्यादा के खातों का ब्योरा हर सप्ताह देना होगा।
देर आयद दुरुस्त आयद। लेकिन कड़ाई की तमाम कवायद और पारदर्शिता बरतने के तमाम दावों के बावजूद बैंकिंग सिस्टम में अब भी कई चोर-रास्ते हैं जिनसे होकर घपलेबाज सेंध लगाते और निकल भागते हैं। ताजा मामले में नीरव मोदी से मिलीभगत वाले कर्मचारी फाइनेंशियल मैसेजिंग सर्विस ‘स्विफ्ट’ का इस्तेमाल करते थे और इसके जरिए बिना पहचान सामने आए लेन-देन किया गया। शेयर बाजार में अपनी पहचान छिपा कर पैसा लगाने की छूट खत्म करने की मांग कई बार उठी, पर आज तक मानी नहीं गई। हमें पारदर्शिता चाहिए, या वह करना है जो पैसे के खिलाड़ी चाहते हैं? कइयों का अनुमान है कि घोटाले का आकार जितना सामने आया है उससे और बड़ा हो सकता है। इस सब की कीमत कौन चुकाएगा? एनपीए से दबे बैंकों को सहारा देने के लिए ‘पुनर्पूंजीकरण’ नाम से ‘सुधार’ का एक कदम उठाया गया। यह लोगों की जेब से आया सरकारी खजाने का पैसा था। जबकि एनपीए के मुख्य दोषी वे लोग हैं जो सैकड़ों, हजारों करोड़ की उधारी दबा कर बैठे हैं।

