समाज के भीड़ में बदलते जाने का अहसास रोजाना अनेक तरह से होता है। बहुत सारे लोगों की मौजूदगी के बीच भी कोई अपने को भयभीत या असहाय महसूस करता है। कुछ लोग मिलकर किसी को पीट कर चले जाते हैं, और ढेर सारे लोग तमाशाई बने रहते हैं। कोई घायल होकर तड़पता रहता है, और तमाम वाहन चालक उस ओर से आंख मूंदे गुजरते रहते हैं। इस तरह के और भी मंजर गिनाए जा सकते हैं। पर कई बार लगता है समाज भीड़ ही नहीं, पागल या हिंसक भीड़ में बदलता जा रहा है। कभी किसी बहाने, तो कभी और नाम पर कोई झुंड किसी अकेले असहाय आदमी पर टूट पड़ता है, अपनी हिंसा को सही मानते हुए। जिसे अंग्रेजी में मॉब लिंचिंग कहते हैं, वैसी घटनाओं के उदाहरण यों तो हर कालखंड में मिल जाएंगे, पर इधर के तीन-चार साल में ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हमलावर भीड़ को या भीड़ में शामिल हमलावरों को मानो यह भरोसा रहता है कि चूंकि वे इक्का-दुक्का नहीं हैं, इसलिए पहचाने नहीं जाएंगे। पुलिस भी अकसर अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज करती है। अगर आरोपियों की पहुंच कुछ ऊपर तक हो, या सत्ता के गलियारे में विचरण करते लोगों की दिलचस्पी उन्हें बचाने में हो, तो आरोपी वाकई अज्ञात ही बने और बचे रहते हैं। सांप्रदायिक दंगों के दौरान न पहचाने जाने और न पकड़े जाने का यह विश्वास और पुख्ता रहता है।
यह बेहद अफसोस की बात है कि भीड़ के हाथों एक अकेले, निस्सहाय आदमी के मारे जाने का ताजा वाकया एक ऐसे राज्य में हुआ, जिसकी पहचान देश के सर्वाधिक शिक्षित और सर्वाधिक प्रगतिशील राज्य के रूप में रही है। पिछले हफ्ते केरल के पलक्कड़ जिले के अगाली नगर में कुछ लोगों ने तीस साल के आदिवासी व्यक्ति मधु को एक दुकान से सामान-चोरी के शक में पीट-पीट कर मार डाला। एक आरोपी ने मौके की सेल्फी भी ली। अलबत्ता मधु की मौत अस्पताल ले जाते वक्त पुलिस की जीप में हुई। जब इस घटना की तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल हुर्इं, तो स्वाभाविक ही पूरे केरल में हंगामा मच गया। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से लेकर विपक्ष के नेता रमेश चेन्नितला और पुलिस महानिदेशक तक, और मलयाली सुपरस्टार ममूत्ती से लेकर सिविल सोसायटी तक, सबने इस घटना को केरल की छवि पर एक कलंक बताया।
पुलिस ने कुछ लोगों की गिरफ्तारी की है, और उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मामले का हश्र भीड़ के हाथों होने वाली हत्याओं के दूसरे मामलों की तरह नहीं होगा। सवाल है कि ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जाए। पहली बात यह कि बड़े पैमाने पर यह बोध जगाने की जरूरत है कि कोई भी प्रसंग या मुद्दा हो, किसी को मारना-पीटना अपराध है। यह अपराध तब भी उतना ही अपराध रहता है, जब उसे कोई झुंड या कोई संगठन अंजाम देता है। अगर किसी व्यक्ति पर कुछ गलत करने का शक है, तो उसे पुलिस को सौंप दिया जाना चाहिए। पुलिस को भी किसी को हिरासत में मार डालने या यातना देने का हक नहीं है। लोकतंत्र बहुमत आधारित शासन प्रणाली जरूर है, पर यह भीड़वाद नहीं है। लोकतंत्र बहुमत के बरक्स व्यक्ति की सुरक्षा और व्यक्ति की गरिमा का भी पाठ पढ़ाता है। इस कसौटी पर हम कहां खड़े हैं!

