इसमें दो राय नहीं कि जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर आजादी के बाद देश में कर-ढांचे या कर-प्रणाली में सबसे बड़ा बदलाव है। लेकिन क्या इसे देश की आजादी के समकक्ष रखा जा सकता है? सरकार के रवैए से तो कुछ ऐसा ही लगता है। जीएसटी लागू करने के अवसर को उसने उस तरह के समारोह का रूप देने की कोशिश की, जैसा पंद्रह अगस्त 1947 को हुआ था। ठीक आधी रात के समय। संसद के केंद्रीय सभागार में। देश को संबोधित करने के लिए नेहरू की जगह मोदी थे। राष्ट्रपति और तमाम मंत्रियों तथा अनेक जानी-मानी हस्तियों की मौजूदगी में उन्होंने जीएसटी को ‘लांच’ किया। बेशक यह मौका काफी अहम था और इसे किस तरह आयोजित किया जाए यह तय करने का हक सरकार को था। लेकिन जीएसटी को किसी भी कोण से देश की आजादी के बराबर नहीं रखा जा सकता। इसलिए आयोजन को लेकर कांग्रेस समेत अनेक विपक्षी दलों का एतराज जायज था। जिस तरह से पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस की आधी रात के समय हुए आयोजन की नकल की गई, वह आजादी का मखौल उड़ाने जैसा है। आजादी के लिए देश के लाखों लोगों ने बरसों-बरस तमाम तकलीफें उठाई थीं, बहुत-से लोग जेल गए, बार-बार गए, लाठियां खार्इं, गोलियां खार्इं, कई लोग फांसी पर चढ़े।
देश की आजादी का संघर्ष कुर्बानियों की अंतहीन दास्तान है। एक कर-प्रणाली का लागू होना देश के आजाद होने जैसी घटना कैसे हो सकता है? आपातकाल हटने को जरूर ‘दूसरी आजादी’ का नाम दिया गया, क्योंकि वह नागरिक अधिकारों के बहाल होने की घटना थी। फिर भी उसे पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस के बराबर रखने या दिखाने की कोशिश नहीं की गई, न तब संसद के केंद्रीय सभागार में आधी रात के वक्त कोई ड्रामा रचा गया। जीएसटी के बारे में अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि कर-प्रणाली के लिहाज से यह देश में अब तक का सबसे अहम मौका है। पर इसे देश के आर्थिक इतिहास की भी सबसे महत्त्वपूर्ण घटना नहीं कहा जा सकता। अगर समाजवादी कोण से देखें, तो जमींदारी उन्मूलन, बैंकों का राष्ट्रीयकरण देश के आर्थिक इतिहास की ज्यादा बड़ी घटनाएं थीं। अगर उदारीकरण की दृष्टि से देखें तो 1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत, सबसे बड़ी घटना थी। तब भी, तत्कालीन सरकार ने पंद्रह अगस्त 1947 की नकल उतारने की जरूरत नहीं समझी। विडंबना यह है कि जीएसटी का ऐसा महिमामंडन वे लोग कर रहे हैं जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए बरसों-बरस जीएसटी का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। राज्यों में सबसे मुखर विरोध गुजरात का था, और तब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। जीएसटी से राज्यों को होने वाले नुकसान बताने के उनके बयान कई जगह दर्ज होंगे।
भाजपा सरकार भले जीएसटी से हजार फायदे गिना रही हो, आज भी बहुत-से लोग सशंकित हैं। खासकर देश के करोड़ों छोटे और खुदरा व्यापारी आशंकित हैं। उनके हितों की रक्षा का हवाला देकर ही भाजपा ने यूपीए सरकार के समय किराना व्यापार में एफडीआइ के प्रस्ताव का सड़क से लेकर संसद तक जबर्दस्त विरोध किया था, और अंतत: तत्कालीन सरकार को अपने कदम पीछे खींचने के लिए विवश होना पड़ा था। लेकिन आज भाजपा के सत्ता में होते हुए, उसी तबके को अपनी आवाज सुनाने के लिए रोज चीखना-चिल्लाना पड़ रहा है। अधूरी तैयारियों की वजह से भी आलोचना के स्वर उठे हैं। क्या जश्न के शोर से इन सब आवाजों को दबाया जा सकता है!
