देश में पिछले कुछ वर्षों से बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है। इससे बड़े स्तर पर युवा श्रम शक्ति का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है और यह राष्ट्र के संपूर्ण विकास में भी अवरोध पैदा कर रहा है। किसी भी अर्थव्यवस्था को तभी संतुलित माना जाता है, जब उसमें आर्थिक विकास के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित होते हों। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कुल कार्यबल तथा जनसंख्या के लिहाज से भारत दुनिया का सबसे बड़ा देश है। यहां युवाओं की आबादी अन्य देशों की तुलना में अधिक है। मगर इस कार्यबल को व्यापक रूप से राष्ट्र के निर्माण में भागीदारी के समान अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

इसका आकलन केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी रपट से किया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि देश में पंद्रह वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों के बीच बेरोजगारी दर पिछले वर्ष दिसंबर में बढ़कर 4.8 फीसद पर पहुंच गई, जबकि नवंबर में यह आंकड़ा 4.7 फीसद था। शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी का असर ज्यादा रहा, जहां इसकी दर नवंबर में 6.5 फीसद से बढ़कर 6.7 फीसद हो गई। इससे स्पष्ट है कि सरकारी और निजी संगठित एवं असंगठित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर घट रहे हैं।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसी योजनाओं की शुरुआत की गई है, लेकिन इनका असर विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रहा है। कई युवा और श्रमिक वर्ग अपने कौशल को विकसित करने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

कृत्रिम मेधा और डिजिटलीकरण के कारण भी रोजगार में कमी आई है। हालांकि, डिजिटल क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित हुए हैं, लेकिन इनमें भी विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, जो हर किसी के पास नहीं है। इसमें दोराय नहीं कि रोजगार की मांग के अनुपात में सरकारी नौकरियों की संख्या में वृद्धि नहीं हो पा रही है।

इसके अलावा, सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और परीक्षा प्रणाली के मुद्दे भी रोजगार हासिल करने के समान अवसरों को प्रभावित करते हैं। हालांकि आंकड़ों के हिसाब से देखें तो शहरों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में राहत की बात यह है कि वहां पिछले वर्ष नवंबर से दिसंबर के बीच बेरोजगारी दर 3.9 फीसद पर स्थिर है।

दरअसल, किसी भी देश में संपूर्ण आर्थिक विकास तभी संभव हो पाता है, जब सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि हो, प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी तथा गरीबी, भुखमरी और सामाजिक असमानता में कमी आए तथा रोजगार की उपलब्धता और प्रति व्यक्ति खुशहाली हो। विकास का माडल ऐसा होना चाहिए, जिसमें रोजगार के अवसर, गरीबों का उत्थान और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित हो सके तथा महंगाई की दर कम रहे।

सवाल है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत का जो लक्ष्य रखा है, क्या मौजूदा परिस्थितियों की लिहाज से उसे तय समय में हासिल किया जा सकेगा! यह सच है कि बेरोजगारी दर में उतार-चढ़ाव से देश के विकास पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है।

ऐसे में सरकार को चाहिए कि बेरोजगारी दर में कमी लाने के लिए शिक्षा को कौशल विकास से जोड़ने को प्राथमिकता दी जाए और सरकारी एवं निजी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर सृजित किए जाएं। तभी भारत सही मायने में एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ पाएगा।