वायु प्रदूषण के मामले में भारत किस खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है, इसका अहसास यों तो यहां के लोगों को रोज-रोज होता है, पर इसकी पुष्टि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट से होती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित बीस शहरों में चौदह शहर भारत के हैं। दिल्ली और वाराणसी भी इसमें आते हैं। जिन आंकड़ों से यह रिपोर्ट बनाई गई है, वे सालाना सर्वे के आधार पर जुटाए गए हैं। हम सिर्फ प्रदूषण में नहीं, बल्कि किसी गैस चैंबर में रह रहे हैं। ऐसे तथ्य पहली बार सामने नहीं आए हैं। वर्ष 2010 से 2016 तक वायु प्रदूषण को लेकर वैश्विक एजंसियों और संस्थानों ने जो रिपोर्टें जारी की हैं, उनमें भी भारत की काफी चिंताजनक तस्वीर सामने आई थी। उत्तर भारत लंबे समय से वायु प्रदूषण की मार झेल रहा है। जो चौदह शहर सर्वाधिक प्रदूषित घोषित किए गए हैं वे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और बिहार के हैं। राजधानी दिल्ली तो लंबे समय प्रदूषण की मार झेल रही है। ये रिपोर्टें चेतावनी दे रही हैं कि अभी वक्त है संभल जाएं, वरना गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।

वायु प्रदूषण की व्यापकता और भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में दस में से नौ लोग जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण उद्योगों से निकलने वाला धुआं और खाना पकाने के लिए जलाई जाने वाली लकड़ी, कोयला और किरासन जैसे र्इंधन हैं। दुनिया में आज भी चालीस फीसद आबादी जलावन के इन्हीं स्रोतों का इस्तेमाल करती है। इनसे निकलने वाला धुआं वायुमंडल में तो बाद में पहुंचता है, पहले तो इस्तेमाल करने वाले ही इसका शिकार बनते हैं और फेफड़े, सांस, हृदय की गंभीर बीमारियां इन्हें जकड़ लेती हैं। मस्तिष्काघात और कैंसर के ज्यादातर मामले वायु प्रदूषण की ही देन हैं। दुनिया में 2016 में सत्तर लाख लोग वायु प्रदूषण की वजह से मारे गए थे।

हालांकि डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट पर ग्रीनपीस और भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने असहमति जाहिर की है। पर्यावरण और वन मंत्रालय का कहना है कि डब्ल्यूएचओ ने जिन आंकड़ों को आधार बना कर रिपोर्ट तैयार की है और भारत के प्रदूषित शहरों की सूची जारी की है, वे 2016 के हैं। ग्रीनपीस का भी यही कहना है। जबकि पिछले दो साल में भारत में हालात सुधरे हैं। अलबत्ता पर्यावरण मंत्रालय ने माना है कि दिल्ली की हवा वाकई काफी खराब है और इसका बड़ा कारण पंजाब और हरियाणा के खेतों में जलाई जाने वाली पराली है। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर केंद्र और राज्य सरकारों को सख्त निर्देश जारी कर चुका है। प्रदूषण से निपटने की दिशा में भारत ने पिछले कुछ सालों में कई कदम उठाए हैं। मसलन, उज्ज्वला योजना के तहत साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा परिवारों को गैस कनेक्शन मुहैया करा कर लकड़ी, कोयले और किरासन से मुक्ति दिलाई गई। पर यह हकीकत झुठलाई नहीं जा सकती कि भारत के शहरों में वायु प्रदूषण जिस खतरनाक रफ्तार से बढ़ रहा है, उसके मुकाबले हमारे प्रयास बौने साबित हो रहे हैं। आंकड़े क्या कह रहे हैं, पुराने हैं अथवा नए, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। सवाल है कि हम जिस जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं, उससे बचाव का रास्ता कैसे निकले!