अमूमन चुनाव नजदीक आने के साथ राजनीतिक दलों के भीतर विवादों को किनारे करने, सुलह-समझौते करने और संगठित होकर मैदान उतरने की कवायदें शुरू हो जाती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को छह साल के लिए निष्कासित करने की घोषणा की है, उससे जाहिर है कि सपा में टूट का रास्ता साफ हो गया है। यह एक ऐसी घटना है जिसका उत्तर प्रदेश की राजनीति और राज्य के आसन्न चुनावों पर गहरा असर पड़ेगा। सपा में पिछले कई महीनों से दो ध्रुवों के बीच तनातनी का दौर जारी था। और ताजा घटना उसी की परिणति है। एक तरफ मुलायम सिंह और उनके भाई शिवपाल यादव हैं, और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव। यानी यह पार्टी के साथ-साथ परिवार के भीतर की भी लड़ाई है। बहुतों के लिए यह अचरज की बात है कि पिता होते हुए भी मुलायम सिंह अखिलेश के साथ नहीं हैं, जबकि देश की राजनीति में बेटे-बेटियों को सत्ता और पार्टी में उत्तराधिकारी बनाने की अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति बढ़ती गई है।
मुलायम सिंह अगर परिवारवाद के खिलाफ होते, तो अखिलेश मुख्यमंत्री न बन पाते, न पार्टी में शिवपाल ही इतने ताकतवर हो पाते। हो सकता है कि अखिलेश से मुलायम की नाराजगी के पीछे कुछ पारिवारिक वजह भी रही हो, पर लगता है कि मुलायम सिंह अपने अहं और पार्टी को अपने पुराने रंग-ढंग से चलाने की जिद के चलते अखिलेश की अहमियत को कभी स्वीकार नहीं कर पाए। वे पार्टी की इस आम भावना को भी नहीं समझ पाए कि वह अखिलेश की छवि के सहारे चुनाव मैदान में उतरना चाहती है। पार्टी अध्यक्ष होने का लाभ उठाते हुए उन्होंने उम्मीदवारों की जो सूची जारी की, उसमें सारे नाम उन्होंने ही तय किए। अखिलेश की नहीं चली। फिर अगले दिन अखिलेश की तरफ से भी एक सूची जारी हो गई। हालांकि दोनों सूची में करीब पौने दो सौ मौजूदा विधायक हैं, मगर बत्तीस सीटों पर जैसे मतभेद सामने आए, उसका हल आखिर नहीं निकल सका।
इसमें कोई संदेह नहीं कि मुजफ्फरनगर दंगों से निपटने को छोड़ कर अपने कार्यकाल में अखिलेश यादव ने एक साफ-सुथरी पहचान वाले नेता के रूप में अपनी जगह बनाई है। यहां तक कि कई मौकों पर पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल यादव के फैसलों को भी पलटने में भी वे नहीं हिचके। जिस तरह उनकी छवि के बूते सपा ने पिछला चुनाव जीता था, उसे बाद में भी उन्होंने बनाए रखने की कोशिश की। पार्टी के ज्यादातर विधायक उनके साथ हैं। अगर सपा टूटती है तो क्या पता अखिलेश का पलड़ा भारी नजर आए। पर क्या चुनाव में भी ऐसा होगा? क्या सपा के टूटने के बाद कोई धड़ा इतना मजबूत होगा कि वह भाजपा और बसपा की चुनौती से पार पा सके? हो सकता है सपा की टूट से नए गठजोड़ या समीकरण बनें। पर नतीजे के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
