करीब छह महीने पहले छत्तीसगढ़, झारखंड और गुजरात आदि राज्यों से ऐसी खबरें आर्इं कि अच्छी फसल होने के बाद टमाटर की न्यूनतम कीमत भी न मिल पाने की वजह से किसानों ने बड़े पैमाने पर टमाटर सड़कों पर फेंक दिए। और आज हालत यह है कि ज्यादातर जगहों पर टमाटर की कीमत तीस-चालीस रुपए से बढ़ते हुए सौ रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। सवाल है कि जो टमाटर खाने की थाली का आम हिस्सा रहा है, थोक मंडियों में उसकी खरीद, भंडारण और खुले बाजार में बिक्री के लिए समूचा तंत्र आखिर कैसे काम रहा है कि एक ओर कभी किसानों की ओर से खुद इसे नष्ट करने की नौबत आ रही है और दूसरी ओर आम लोगों के लिए अपने भोजन में टमाटर शामिल करना एक सपना हो गया है! कई बार प्याज को लेकर भी यही स्थिति आ जाती है कि कभी किसानों की लागत भी नहीं निकल पाती तो कभी उसकी कीमत लोगों की पहुंच से बाहर हो जाती है। लेकिन इस साल टमाटर की इस हालत के लिए केवल मंडियों में किसानों से खरीद में अव्यवस्था ही जिम्मेदार नहीं है।

दरअसल, पिछले साल आठ नवंबर को जब केंद्र सरकार ने पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट अचानक बंद करने की घोषणा की थी और उससे बाजार में लोगों के पास पैसों को लेकर जो फिक्र और अफरातफरी मची, टमाटर का ताजा संकट उससे भी जुड़ा है। अच्छे मानसून की वजह से खरीफ फसलों की उपज बेहतर रही। लेकिन जब उसकी थोक खरीद से आगे खुदरा बाजार में पहुंचने का वक्त आया तो उसी वक्त नोटबंदी के चलते पैदा हुए हालात ने खरीद-बिक्री पर बेहद बुरा असर डाला। स्थिति यह थी कि बाजार में टमाटर महज तीन-चार रुपए किलो बिक रहे थे। लेकिन थोक मंडी में किसी किसान को जब चार रुपए प्रति किलो की लागत का टमाटर महज पचास रुपए प्रति क्विंटल बेचना पड़े तो उसकी दयनीय हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसके अलावा, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में टमाटर का निर्यात बाधित होने की वजह से भी यह समस्या गंभीर हुई है। गौरतलब है कि देश में कर्नाटक, महाराष्ट्र और हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा टमाटर की उपज होती है। खासतौर पर बेंगलुरु के पास कोलार इलाका टमाटर के उत्पादन के मामले में समूचे एशिया में दूसरे नंबर पर है। लेकिन पिछले साल के कड़वे अनुभवों और अगली फसलों का यही हश्र होने की आशंका में किसानों ने कहीं टमाटर की खेती कम की, या कहीं फसल खेत में ही नष्ट कर दी।

मुश्किल यह भी है कि टमाटर की फसल को बीमा योजना के दायरे से बाहर रखा गया है। जबकि ऐसे तमाम किसान हैं जिन्होंने इसके लिए बैंकों से कर्ज लिया। अब जिनकी उपज की उचित कीमत नहीं मिल सकी या जिन्हें टमाटर नष्ट करना पड़ा, उनकी तकलीफ समझी जा सकती है। सवाल है कि जब किसी भी फसल की पैदावार में लगे किसानों को उपज की वाजिब न्यूनतम कीमत भी नहीं मिल सकेगी, तो वे आखिर क्यों उसकी खेती में खुद को झोंकेंगे। इतना ही अहम सवाल यह भी है कि अगर किसानों को न्यूनतम कीमत भी नहीं मिल रही है, तो वह उपज बाजार में इतनी महंगी क्यों है?