पूर्णबंदी के बाद बेरोजगार हुए बहुत सारे लोगों के सामने जैसे जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो गया है। कल-कारखाने, दुकान, दिहाड़ी बंद हुई तो शहरों में बड़े पैमाने पर जीविका के साधन छिन गए। ऐसे में लोगों को अपने गांव लौटने के अलावा कोई चारा न था। सो, लाखों लोग इस उम्मीद में गांव लौट गए कि वहां पहुंच कर कम से कम अपने लोगों के बीच रहेंगे, वहां भूखों मरने की नौबत तो न आएगी, मगर वह भी छलावा साबित हो रहा है। गांव-घर की जिस बदहाली से तंग आकर वे सपने बुनते हुए शहर गए थे, वही उनके सामने मुंह बाए फिर खड़ी हो गई। सरकारों ने उन्हें सहारा देने के लिए योजनाएं घोषित कीं, पर वे भी उनके काम नहीं आ रहीं। आज स्थिति यह है कि असम के कोकराझार का एक प्रवासी मजदूर परिवार पालने के लिए अपनी नवजात बच्ची का सौदा करता पकड़ा गया।

हालांकि पूर्णबंदी के बाद बेरोजगारी के आलम में यह अपने तरह की पहली घटना प्रकाश में आई है, पर असम, ओड़ीशा, झारखंड आदि राज्यों के लिए नई नहीं है। गरीबी झेल रहे कई लोगों के लिए अपनी बेटियों का सौदा करना आसान जरिया नजर आता है। गनीमत है, असम की घटना में समय रहते पुलिस को सूचना मिल गई और उसने बच्ची के पिता और मानव तस्करी में शामिल दो महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

गरीबी और भुखमरी झेल रहे इलाकों मेें बच्चियों की खरीद-बिक्री और तस्करी पर रोक लगाना बड़ी चुनौती है। अनेक अध्ययन और मानवाधिकार कार्यकर्ता सिफारिश कर चुके हैं कि असम, पश्चिम बंगाल, ओड़ीशा, झारखंड के कुछ इलाकों में जिन्हें दो वक्त का भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पाता, वे अपनी बच्चियों को मानव तस्करों के हाथों बेचने पर मजबूर होते हैं। अगर ऐसे परिवारों की पहचान कर उनके भोजन की व्यवस्था की जा सके, तो बच्चों की तस्करी पर रोक लगाई जा सकती है।

पर ऐसा नहीं हो सका है, जिसके चलते मानव तस्करों का गिरोह उन इलाकों में सक्रिय है। असम के कोकराझार जिले का मजदूर भी अपनी बच्ची को बेचने का कदम इसीलिए उठा पाया, क्योंकि उसकी नवजात ाच्ची के खरीदार सहज उपलब्ध थे। मगर चिंता की बात है कि उसे इस तरह के कदम उठाने पड़े। उसने परिवार का पेट पालने के लिए रोजगार तलाशने की भरसक कोशिश की, पर कहीं कामयाबी नहीं मिल पाई, इसलिए वह हताश हो गया था। उसे कोई काम-धंधा मिल जाता, तो शायद यह कदम न उठाता।

बंदी के बाद खासकर प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन आदि के लिए सरकारों ने योजनाएं चला रखी हैं। फिर ऐसा क्या था कि उस मजदूर को अपने परिवार का पेट भरने के लिए बच्ची बेचने जैसा कदम उठाना पड़ा। यह असम सरकार की तैयारियों पर भी सवाल है। अभी कोरोना संकट नहीं टला है और कल-कारखाने, कारोबार वगैरह बेशक शुरू हो गए हैं, पर आर्थिक मंदी के चलते उनकी गति बहुत धीमी बनी हुई है। ऐसे में रोजगार के संकट और गहराने की आशंका है।

सरकारें चाहे जितने दावे कर रही हों कि लोगों को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार उपलब्ध कराए जा सकेंगे, पर हकीकत यह है कि बहुत सारे लोगों के सामने दो वक्त की रोटी जुटाने का भी कोई जरिया नहीं रह गया है। ऐसे में हवाई घोषणाएं और खोखले वादे छोड़ कर सरकारों को हकीकत का सामना करते हुए व्यावहारिक कदम उठाना चाहिए।