अब तीन तलाक के मामले में सर्वोच्च अदालत के सामान्य पीठ के बजाय वृहद संविधान पीठ सुनवाई करेगा। एक बहुविवादित मसले को हल करने की दिशा में यह वाजिब कदम है। पांच सदस्यीय संविधान पीठ गरमी की छुट्टियों में भी तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह के सवाल पर रोजाना सुनवाई करेगा। कई मुसलिम महिलाओं ने तीन तलाक जैसी अनेक शरई परंपराओं को खत्म करने की याचिकाएं दाखिल कर रखी हैं। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि अगर उसने इस पर अभी फैसला नहीं किया तो यह सालोंसाल लटका ही रहेगा और शायद दशकों तक विवाद बना रहे। अदालत के इस रुख से आस बंधी है कि शायद इस बारे में कोई आखिरी फैसला हो जाए। उपर्युक्त याचिकाओं के अलावा केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल करके कुछ बिंदुओं की व्याख्या करने और निर्देश जारी करने का अनुरोध किया था।
केंद्र की याचिका में पूछा गया है कि तीन तलाक (तलाके-बिद््दत), निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा को भारतीय संविधान में किस तरह का संरक्षण प्राप्त है? मुसलमानों में इस तरह के चलन को धार्मिक आजादी से जोड़ कर देखा जा सकता है या नहीं? जबकि, आल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी थी कि परंपराओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं विचारणीय नहीं हैं, क्योंकि ये मुद््दे न्यायपालिका के दायरे में नहीं आते; पवित्र कुरआन पर आधारित मुसलिम विधि की वैधता संविधान के कुछ खास प्रावधानों की रोशनी में तय नहीं हो सकती। हालांकि अदालत ने तभी कह दिया था कि ये मुद्दे विधायी क्षेत्राधिकार में आते हैं। तीन तलाक समेत कई मुद्दों पर चर्चा पहले भी होती रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चुनौती शायद पहली बार दी गई है। कई संगठन इस पर खुली बहस करने की बात करते रहे हैं। मुसलिम धर्मगुरुओं का यह भी आरोप है कि भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टियां मुसलिम महिलाओं के शोषण का मुद्दा उठा कर परदे के पीछे से अपना सिविल कोड लागू करने कोशिश कर रही हैं। यह मसला मुसलिम समुदाय का है, इसलिए इसका समाधान भी उसे ही ढूंढ़ना चाहिए। पर जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर नियमित सुनवाई करने का फैसला कर लिया है तो अगर-मगर का सवाल खत्म हो जाता है।
सियासी और मजहबी संगठन बिना मतलब के जुबानी जंग करते रहें या इसे किसी झगड़े की वजह बना लें, इससे लाख गुना बेहतर है कि अदालत दूध का दूध, पानी का पानी कर दे। सवाल यह भी है कि तरक्की के रास्ते पर बढ़ता हुआ कोई देश या समाज किन्हीं पुरातनपंथी नियम-कायदों से क्यों घसीटा जाए? आज के दौर में कोई यह मंजूर नहीं करेगा कि किसी को चार शादियां करने का अधिकार हो या कोई तीन बार तलाक बोल कर अपनी पत्नी को घर से निकाल दे। यह सही है कि हमारे संविधान में विभिन्न समुदायों को धार्मिक आजादी दी गई है, पर यह असीमित नहीं है। जहां भी संविधान से प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर आंच आती हो, वहां न्यायपालिका से दखल देने की मांग स्वाभाविक ही उठेगी। और इस मामले को पीड़ित महिलाओं की तरफ से और नागरिक अधिकारों के नजरिए से ही देखा जाना चाहिए, न कि धार्मिक ध्रुवीकरण के चश्मे से।

