अपने हक के लिए आवाज उठाना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। मगर इसका तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। अपने हक की आवाज उठाने से अगर किसी की निजता में खलल पड़ता है, तो उस पर अंगुली उठना स्वाभाविक है। पंजाब में किसान आंदोलन की वजह से जिस तरह रेल सेवाएं बाधित हुईं और मुसाफिरों को नाहक परेशानी उठानी पड़ी, उससे एक बार फिर आंदोलन के तरीके को लेकर सवाल उठे हैं।

किसानों ने पहले ही कर दी थी आंदोलन की घोषणा

पंजाब और हरियाणा के किसान बाढ़ और बारिश की वजह से फसलों को हुए नुकसान के माकूल मुआवजे, न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने और कर्ज माफी की मांग लेकर आंदोलन पर उतरे थे। हालांकि उन्होंने इसकी घोषणा पहले ही कर दी थी कि अगर सरकारें उनकी मांगें नहीं मानेंगी, तो वे तीन दिन का रेल रोको आंदोलन करेंगे।

सबसे ज्यादा दिक्कतें कटरा और जम्मू में आईं

मगर शायद रेलवे ने उनकी इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया और जब किसान रेल की पटरियों पर बैठ गए, तब गाड़ियों का रास्ता बदला गया, कई गाड़ियां रद्द कर दी गईं। इससे हजारों लोगों को तीन दिन तक परेशानियों का सामना करना पड़ा। सबसे अधिक दिक्कतें लोगों को कटरा और जम्मू में पेश आईं। किस तरह लोगों ने रेलवे स्टेशनों पर बैठ कर रातें गुजारीं, किस तरह बहुत सारे लोगों को अपने कई जरूरी काम छोड़ने पड़े, उसके ब्योरे सामने आ रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है, जब किसान बर्बाद हुई फसलों के मुआवजे, फसलों की वाजिब कीमत और कर्जमाफी वगैरह को लेकर आंदोलन पर उतरे और इस तरह यातायात बाधित किया। चंडीगढ़ से दिल्ली को जोड़ने वाले राजमार्ग को कई बार बाधित किया जा चुका है, इस बार भी लोगों को घंटों सड़कों पर रुके रहना पड़ा। किसानों की मांगों को अनुचित नहीं कहा जा सकता, हालांकि सरकारों के लिए उन्हें पूरा करने में कई तरह की अड़चनें पेश आ सकती हैं।

मगर इसका मतलब यह नहीं कि उनकी बात सुनी ही न जाए। अगर सरकार उनसे बातचीत करके बीच का कोई रास्ता निकालने का प्रयास करती, तो शायद बार-बार इस तरह किसानों को कठोर कदम न उठाने पड़ते। पंजाब और हरियाणा में किसानों के संगठन ताकतवर और सक्रिय हैं, इसलिए वे सरकारों पर दबाव बनाने की स्थिति में आ जाते हैं।

फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का कानून बनाने पर उसी समय सहमति बन गई थी, जब तीन कृषि कानूनों को समाप्त करने की घोषणा हुई थी। मगर अभी तक उस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका है, इसलिए किसान हर नई मांग के साथ उस मांग को नत्थी कर देते हैं।

दरअसल, तीन कृषि कानूनों के खिलाफ खड़ा हुआ आंदोलन इस घोषणा के साथ समाप्त हुआ था कि अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानून नहीं बनता है, तो किसान फिर से आंदोलन पर लौट आएंगे। इस तरह रेल रोको आंदोलन के जरिए किसानों ने यह भी संदेश देने की कोशिश की कि सरकार को जल्दी इस दिशा में गंभीरता दिखानी चाहिए।

मगर जैसा कि सरकारों की आदत रही है, वे किसानों की मांगों को नजरअंदाज करती रही हैं, इस बार भी वही तरीका अपनाया गया। इस तरह समस्याओं के समाधान नहीं निकलते, बल्कि उन्हें लेकर हंगामे की संभावना बनी रहती है।

आंदोलनकारी तभी कठोर कदम उठाने पर विवश होते हैं, जब सत्तापक्ष उनसे किसी तरह का संवाद करने की कोशिश नहीं करता। मगर किसानों को भी यह समझने की जरूरत है कि आंदोलन का स्वरूप अलोकतांत्रिक न हो।